पुण्यप्रसून बाजपेयी पर पत्रकारों का एक पूरा खेमा आपात्काल का रोना रो रहा है। सवाल यह है कि इतने वर्षो से उनकी तानाशाही का हिसाब कौन देगा : रवि शंकर

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पुण्यप्रसून बाजपेयी आदि को आज आपात्काल दिख रहा है। यदि कल रवीश कुमार के साथ कुछ हो जाए तो उन्हें भी दिखने लगेगा। पत्रकारों का एक पूरा खेमा है जो आपात्काल का रोना रो रहा है। सवाल यह है कि उन्होंने स्वयं जो तानाशाही इतने वर्षों तक चलाई है, उसका हिसाब कौन देगा?

लंबे समय तक संघ का स्वयंसेवक होना पत्रकारिता की नौकरी मिलने की सबसे प्रमुख अयोग्यता थी। अधिक पुरानी बात नहीं करुंगा। केवल छह-सात वर्ष पुरानी बात है। नवभारत टाइम्स में आवेदन किया। लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर लिया। पेजमेकिंग की परीक्षा से भी निकल आया। अब आई साक्षात्कार की बारी। साक्षात्कार से पहले ही वहाँ काम कर रहे मेरे कुछ मित्रों ने मुझे समझाया था कि स्वयंसेवक होने की बात मत बताना। संघ से संपर्क की बात को छिपा लेना। यह मैं नहीं कर सकता था।

साक्षात्कार में प्रारंभिक प्रश्न तो ठीक थे, परंतु जैसे ही मैंने उन्हें बताया कि मैं संघ का प्रचारक रहा हूँ, उनके चेहरे के भाव बदल गए। फिर प्रश्न भी अप्रासंगिक होने लगे। नौकरी नहीं मिलनी थी, सो नहीं मिली। क्या कभी भी पुण्यप्रसून और रवीश सरीखे लोगों को यह आपात्काल प्रतीत हुआ? नहीं। वैचारिकता के नाम पर यह तानाशाही उन्हें स्वीकार थी।

समस्या राष्ट्रवादियों के साथ भी कम नहीं आई। आज के एक बड़े राष्ट्रवादी पत्रकार उस समय एक टीवी चैनल में काम कर रहे थे। यह भी पुरानी बात है लगभग 10-11 वर्ष पुरानी। मैंने एक संघ के ही अधिकारी के माध्यम से उनसे संपर्क किया। उन्होंने मिलने का समय दे दिया। मिलने पर पूछा कि चैनल में काम करने का अनुभव है क्या? यह सही है कि चैनल में काम करने के लिए चैनल में काम करने का अनुभव चाहिए। परंतु वे स्वयं क्या पैदा होते ही चैनल में काम कर रहे थे? नहीं, वे प्रिंट से वहाँ गए थे। उन्होंने यह देखने का प्रयास नहीं किया कि क्या मैं काम तेजी से सीख सकता हूँ या नहीं। एक प्रश्न और संभावनाएं समाप्त। तो क्या चैनलों में प्रिंट से लोग नहीं जाते? जाते हैं और खूब जाते हैं। परंतु फिर भी यह एक तरीका है अपनी मनमानी चलाने का।

बहरहाल, स्वानुभव सुनाने का स्वभाव नही है। फिर भी पुण्यप्रसून जैसों के पाखंड पर हँसी आती है। इसलिए उनके समर्थन में उछलने वाले लोगों को बताना कई बार आवश्यक लगने लगता है।

 

लेख रवि शंकर की फेसबुक पेज से लिया गया है I लेख में दिए गये विचारों के लिए कालिदास क्लब का सहमत या असहमत होना अनिवार्य नहीं है I

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