क्या प्रधानमंत्री मोदी की सरकार पहले ही गरीबों को कांग्रेस के प्रस्तावित लाभ से अधिक नहीं दे रही है? -अरुण जेटली

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कांग्रेस ही वह अगुआ पार्टी है जिसने सात दशकों में भारतीय जनता सबसे अधिक धोखा दिया हो। इस पार्टी ने भारतीयों को अनेकों नारे तो दिए लेकिन उनको पूरा करने के लिए संसाधन का प्रबंध नहीं किया। नेहरू के दौर में भारत की आर्थिक प्रगति की दर 3.5% प्रतिशत के मामूली दर पर थी। जब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं तेज गति से आगे बढ़ रही थीं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था को अपना रहे थे, तत्कालीन सरकार ने तय किया वे नियंत्रित अर्थव्यवस्था की प्रणाली को अपनाएंगे। इंदिराजी को अर्थव्यवस्था की तुलना में नारों की ज्यादा बेहतर समझ थी। मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और नीतिगत त्रुटियों ने भारत की क्षमता को कमजोर किया।

साल 1991 में बड़े आर्थिक सुधारों की शुरूआत हुई, जो इंदिरा द्वारा अर्थव्यवस्था को पहुंचाए गए नुकसान को सुधार के रास्ते पर लाने की पहल थी। साल 1971 में इंदिरा ने “गरीबी हटाओ” का लोकप्रिय नारा दिया। उनकी अर्थनीति उत्पादन बढ़ाने और उत्पादक परिसंपत्तियों को तैयार करने पर केंद्रित नहीं थी, बल्कि गरीबी का पुनर्वितरण करना था।

इंदिरा ने 1971 के बाद चुनाव—दर—चुनाव भारत के बड़े तबके को गरीबी से मुक्त करने के कल्याणकारी वायदे को आजमाया। राजीव गांधी के पास भी गरीबी को दूर करने का ऐतिहासिक अवसर था। वे मानो ऐसा करने की इच्छा भी रखते दिखे लेकिन उनकी सरकार अनेक विवादों में घिरती चली गई जिससे गरीबी उन्मूलन में कोई उल्लेखनीय और बड़ी उपलबिध हासिल नहीं हो सकी।

1971 में इंदिरा जी ने “गरीबी हटाओ” का नारा दिया। बीते 48 सालों में उनकी पार्टी दो—तिहाई अवधि तक सरकार में रही। बावजूद इसके कांग्रेस ने गरीबी को विरासती बना दिया। साल 2004—14 के बीच संप्रग सरकार ने अनेकों अधिकार केंद्रित नीतियों की घोषणाएं की, लेकिन उन्हें क्रियान्वित करने के लिए संसाधन नहीं थे।

70 हजार करोड़ रूपये की ऐतिहासिक कृषिऋण माफी योजना एकमुश्त समाधान योजना रही। सीएजी की​ रिपोर्ट के अनुसार इस 72 हजार करोड़ की राशि में से 52 हजार करोड़ रूपये ही आवंटित किए गए और उसमें से भी काफी बड़ी राशि नईदिल्ली के कारोबारियों को पहुंच गई। इसी तरह मनरेगा योजना ग्रामीण भारत की योजना थी जिसके लिए आवंटित 40 हजार करोड़ रूपये प्रतिवर्ष की तुलना में 28—30 हजार करोड़ रूपये प्रतिवर्ष ही खर्च किए जा सके।

कांग्रेस अध्यक्ष ने आज जिस योजना का ऐलान किया है उसके अनुसार 6 हजार रूपये प्रतिमाह आमदनी वालों को आय सब्सिडी उपलब्ध कराया जाएगा जिससे उनकी आय 12 हजार रूपये प्रतिमाह हो जाएगी। यह घोषणा इस बात की स्वीकारोक्ति है कि न तो इंदिरा जी, न ही उनके सुपुत्र और न ही उनके परिवार द्वारा संचालित यूपीए सरकार गरीबी को दूर कर पाने में सफल हुई।

जब से “गरीबी हटाओ” का नारा दिया गया, तब से सामान्य रूप से कांग्रेस और विशेषकर गांधी परिवार ने इस कालखंड़ के दो—तिहाई समय भारत की सत्ता में रही है। यदि वे अपने इतने लंबे कार्यकाल में गरीबी हटाने की परियोजना में विफल रहे हैं तो आज भारत उनकी बातों का कितना यकीन करे? हालांकि इस योजना के विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है लेकिन बताया गया है कि यह प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण यानि डीबीटी होगी। कांग्रेस पार्टी के अपने अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि इस योजना का वित्तीय घाटे पर कोई असर नहीं होगा।

कृषिऋण माफी योजना का फरेब

पंजाब, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक में कांग्रेस ने कृषिऋण माफी का ऐलान किया था। अधिकतर राज्यों में यह वायदा अधूरा है। कांग्रेस पार्टी के पास ऐसे वायदों—नारों की सूची लंबी है जिनको पूरा करने के लिए वित्तीय संसाधन का प्रबंध ही नहीं है। कांग्रेस के पास ऐसे फरेबी घोषणाओं का भरा—पूरा इतिहास है। कर्नाटक ने इस योजना में 2600 करोड़, मध्यप्रदेश ने 3000 करोड़ और पंजाब ने 5500 करोड़ रूपये ही उपलब्ध कराए हैं। किसान आज भी अपने कृषिऋण माफी का इंतजार कर रहे हैं।

आय समर्थन

गांवों में बसने वाले भूमिहीन और गरीब मनरेगा योजना के तहत भुगतान पाते हैं। मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी को 42 प्रतिशत बढ़ाया गया है। आज अधिकांश औद्योगिक कामगारों को 12000 रूपये प्रतिमाह से अधिक का वेतन मिलता है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद सरकारी नौकरियों में वेतन की सबसे निचली सीमा 18000 रूपये प्रतिमाह है। आवास, सड़कें, शौचालय, बिजली, रसोईगैस सब्सिडी, फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा छोटे व सीमांत किसान भी न्यूनतम आमदनी समर्थन का लाभ पाएंगे।

विपक्ष द्वारा गरीबहितैषी योजनाओं का अनिष्ट

यदि कांग्रेस पार्टी और उनके मित्र दल भारत में गरीबों की दशा को लेकर इतने ही चिंतित हैं तो उनके शासित राज्य PM KISAN योजना के तहत किसानों को मिलने वाले लाभों को उपलब्ध कराने के लिए लाभार्थियों के चयन में धीमी गति से काम क्यों कर रहे हैं? दिल्ली, पश्चिम बंगाल और ओडीशा जैसे अन्य राज्य आयुष्मान भारत योजना को लागू क्यों नहीं कर रहे हैं? आखिर उन गरीब किसानों का अपराध क्या है कि वे अपने हिस्से के भुगतान से वंचित कराए गए है?

गरीबों के समर्थन में मोदी सरकार

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने बीते पांच सालों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण यानि डीबीटी की बैंकों के जरिए शुरूआत की। 55 मंत्रालयों द्वारा खाद्यान्न, उर्वरकों, मिट्टी के तेल जैसे अनेकों सब्सिडी को आधार प्रणाली का उपयोग करते हुए डीबीटी के जरिए गरीबों तक पहुंचाया गया है। कांग्रेस ने तो संसद में आधार का विरोध किया था और सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती तक दी थी। विडंबना यह है कि वे आज उसी आधार तंत्र का उपयोग करना चाहते हैं।

आधार, डीबीटी और अन्य प्रणालियों से गरीबों को पहुंचा संसाधन और लाभ

(1) 55 मंत्रालयों द्वारा विभिन्न योजनाओं के तहत लोगों तक डीबीटी से पहुंचाई गई राशि:: 1.8 लाख करोड़ रूपये
(2) सभी तरह की खाद्यान्न सब्सिडी:: 1.84 लाख करोड़ रूपये
(3) उवर्रक सब्सिडी:: 75 हजार करोड़ रूपये
(4) 55 करोड़ लोगों के लिए आयुष्मान भारत योजना की चिकित्सा सब्सिडी:: 20 हजार करोड़ रूपये

1+ 2+ 3+ 4 = 5.34 लाख करोड़ रूपये

यह साधारण गणित है कि यदि पांच करोड़ गरीब परिवारों को बैंकों के जरिए लाभ को पहुंचाया जाए जो अधिकांश मामलें में किया जा रहा है तो मौजूदा प्रणाली में यह प्रति परिवार Rs.1,06,800 प्रति वर्ष बैठता है जबकि कांग्रेस की घोषणा 72 हजार रूपये प्रतिवर्ष की है। उपरोक्त 534 लाख करोड़ रूपये की सहायता के अलावा कई हजार करोड़ रूपये की अनेकों दूसरी योजनाओं में गरीबों को सब्सिडी की राशि पहुंचाई जा रही है जो पीएम आवास योजना, रसोईगैस, बिजली, स्वच्छता और अनेकों दूसरी सामाजिक योजनाएं शामिल हैं। यदि कांग्रेस पार्टी की घोषणा को सामान्य अंकगणित पर परखा जाए तो पांच करोड़ परिवारों के लिए 72000 रूपये प्रत्येक परिवार की राशि 3.6 लाख करोड़ ही बैठती है, जो मौजूदा सरकार द्वारा हस्तांतरित हो रही राशि का दो—तिहाई ही है।
ये लेख अरुण जेटली के ब्लॉग से लिया गया है जिसका अनुवाद पुष्पेन्द्र कुमार जी ने किया है

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