अटल काव्यांजलि में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का सम्मान और गीत ऋषि गोपाल दास नीरज का अपमान क्यों ? -विवेक बाड़मेरी

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भाजपा नेताओं द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का सम्मान किया जा रहा है वो भी कवि गोपाल नीरज के नाम से संचालित ट्रस्ट के जरिये। ये अच्छी बात है भारत रत्न वाजपेयी जी का सम्मान हो लेकिन काव्यांजलि नामक कार्यक्रम में आखिर पद्मभूषण नीरज का जिक्र तक नही करना, न उनकी तस्वीर न कोई पुष्प माला।  सिर्फ इसलिए कि नीरज जिस समाज का प्रतिनिधित्व करते रहे वो राजनीतिक अछूत हो चला है ?
इन शब्दों को समझने के लिये जरा गौर फरमायें – 
हाल ही में पद्मभूषण कवि गोपालदास नीरज का स्वर्गवास हुआ तब एक माननीय नेता जी ने उनके नाम को लेकर एक न्यास “ट्रस्ट”बनाया। कायस्थ समाज ने भी ख़ुशी जाहिर करते हुये इसका स्वागत किया। इसके कुछ ही दिन बाद देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का स्वर्गवास हो गया और एक होड़ लग गयी थी उनकी पार्टी के नेताओं में उनके नाम को भुनाने की।  जिस अटल को पिछले चार साल तक इस पार्टी के नेताओं ने राजनीतिक रूप से अछूत माना। न कभी पोस्टर में न ही 6 A कृष्णा मेनन मार्ग स्थित उनके आवास के आसपास नजर आये। वे एकाएक अटल के अनुयायी बनने की होड़ में लग गए।  पहले अटल की अस्थि विसर्जन के नाम पर “लौटों” में विसर्जन का प्रोपेगेंडा रचा गया। जिसकी मजाक सब जगह बनी।  हद तो जब हो गयी जब भाजपा नेता उन लौटों के साथ सेल्फी खिंचवाते नजर आने लगे।
पिछले कई दिनों से दिल्ली से पटना और मुजफ्फरपुर तक एक कार्यक्रम नीरज स्मृति न्यास द्वारा आयोजित हो रहा है “अटल काव्यांजलि”।
क्या कोई बता सकता है कि इस कार्यक्रम में नीरज की फोटो पर एक भी हार चढ़ाया गया ?
क्या वाजपेयी के नाम पर राजनितिक फायदा लेने का उद्देश्य नजर आते ही नीरज को भुला दिया गया ?
वाजपेयी का राजनीतिक कद अवश्य ऊँचा था पर बात काव्य की हो तो क्या नीरज उनके समकक्ष नहीं थे ?
आखिर क्यों कायस्थ समाज की भावनाओं से इस तरह खिलवाड़ किया जाता है ?
दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर आयोजित कार्यक्रम से कोई एतराज नहीं है लेकिन बस एक कविता वाजपेयी जी के ही शब्दों में उब्का जवाब है “छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता” उम्मीद करता हूँ आगामी कार्यक्रम में इस बात का ख्याल रखा जायेगा।
मेरी बातों से किसी को चोट पहुंची हो तो माफ़ी चाहता हूँ लेकिन क्या करूं कलम से समझौता कभी किये नहीं
विवेक बाड़मेरी
लेख में दिए विचार लेखक के अपने है , कालिदास क्लब का उससे सहमत या सहमत होना आवश्यक नहीं है 

 

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