लेकिन हमें क्या, हम तो केजरीवाल जी के फ़ैन हैं – अजीत भारती

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आज दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों से जुड़ी एक ख़बर पढ़ी कि हायकोर्ट ने उन्हें फीस बढ़ाने की पूरी आज़ादी दी है। केजरीवाल सरकार ने पहले कहा था कि स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले सरकार से परमिशन लेनी होगी।

यूँ तो एक खुली व्यवस्था में प्राइवेट संस्थानों को छूट होती है, लेकिन कुछ जगहों पर अगर रेगुलेशन रहे, तो बेहतर है। हालाँकि, यहाँ एक बहुत बड़ा पेंच यह है कि जहाँ आप सरकार को इसमें ले आते हैं, घूस खाकर फीस बढ़ाने की छूट मिल सकती है। मतलब यह कि सरकार ने अपने लिए भ्रष्टाचार का एक नया तरीक़ा ढूँढ निकाला। मैं यह नहीं कह रहा कि केजरीवाल सरकार ने ऐसा किया, लेकिन सरकारें ऐसा करती हैं, और कर सकती हैं।

इसके लिए कोई व्यवस्था होनी चाहिए जो रेगुलेशन करे और देखे।

यूँ तो, केजरीवाल सरकार द्वारा स्कूलों के क्षेत्र में किए कार्य को लेकर मैंने उनकी कई बार सराहना की है, लेकिन पिछले दिनों जब कुछ आँकड़े पढ़े तो वो आँखें खोलने वाले थे। सरकार का वादा था 500 स्कूल खोलने का, अभी तक खुले हैं 25 स्कूल।

ऐसा नहीं है कि पैसे नहीं हैं सरकार के पास। पैसे बहुत हैं, इतना कि शिक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा, 4000 करोड़ (कुल बजट 15000 करोड़) ख़र्च नहीं हो पाया।

इसके साथ ही, विज्ञापनों में ‘हमारे इतने प्रतिशत बच्चे पास कर रहे हैं’ के चक्कर में इन्होंने लगभग दो तिहाई फेल बच्चों को शिक्षा व्यवस्था से ही बाहर कर दिया।डेढ़ लाख बच्चे (9-12वीं तक) पिछले सत्र में अनुत्तीर्ण रहे थे, इसमें मात्र 52000 को स्कूलों में लिया गया, बाकी एक लाख से ज़्यादा बच्चे शिक्षा प्रणाली में नहीं हैं।

और तो और, पास करने का प्रतिशत पिछले एक दशक में सबसे नीचे है। साथ ही, पास प्रतिशत बेहतर दिखे इसके लिए अनौपचारिक तौर पर बच्चों को उनके पसंद की स्ट्रीम चुनने से मना किया जाता है। गणित और विज्ञान में फेल करने का प्रतिशत ज़्यादा है तो बच्चों को उस स्ट्रीम में एडमिशन लेने से रोका जाता है।

रोजगार और शिक्षकों को परमानेंट करने की बातें भी खूब हुईं। लेकिन इसका सच भी वही निकलकर आया कि गेस्ट टीचर्स अभी भी लिए जा रहे हैं। हजारों रिक्तियाों में अभी भी नियुक्ति नहीं हुई है, जो पद भरे गए हैं उनमें से भी 17000 गेस्ट टीचर ही हैं।

ये कुछ आँकड़े हैं जो पब्लिक डोमेन में हैं। हालाँकि कुछ स्कूल बने हैं, और उनका इन्फ़्रास्ट्रक्चर विज्ञापनों में जैसा दिखाया जाता है, वो बहुत बेहतर है। इसमें कोई दोराय नहीं, कि वो अगर वैसे हैं तो तारीफ़ होनी चाहिए, लेकिन अगर 68% बच्चे फेल होने के बाद स्कूलों से बाहर किए जा रहे हैं, तो फिर शिक्षा व्यवस्था का विज्ञापन एक ढकोसला लगने लगता है।

शीला दीक्षित के समय स्वीमिंग पूल वाले स्कूल बेशक नहीं थे, लेकिन बच्चे स्कूलों में होते थे, और ‘प्रतिभा विकास’ विद्यालयों की तर्ज़ पर शिक्षा में बुनियादी सुधार हुए थे। अगर बेहतर पासिंग प्रतिशत विरासत में मिला हो, और आपने बच्चों को स्ट्रीम के चयन से लेकर कमजोर बच्चों को प्रणाली से ही बाहर कर दिया, और फिर भी उत्तीर्ण होने का प्रतिशत दस सालों में सबसे कम हो, तो ये बहुत कुछ कहता है।

लेकिन हमें क्या, हम तो केजरीवाल जी के फ़ैन हैं
अजीत भारती

लेख में दिए विचार लेखक है कालिदास क्लब का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है 

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