#भारतबंद_नहीं_हैं.. राजनीति ने इंसान होना ही बंद कर दिया है- दीपक पाण्डेय

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कुछ लोग #भारतबंद के समर्थन में हैं तो कुछ विरोध करने को तैयार हैं और वो मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं जिन्होंने इस सारे प्रकरण की जमीन तैयार की है..

सबसे पहले तो आप यह जान लीजिए कि एससी/एसटी एक्ट का प्रावधान ‘भीमराव रामजी अम्बेडकर’ ने नहीं करवाया था, उनकी मौत तो साल 1956 में ही हो गई थी..

इस एक्ट को साल 1989 में कांग्रेस ने लागू करवाया था और इस पूरे उपद्रव के केन्द्र में भी ये ही लोग हैं..

इस प्रकरण को आप मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग लाए जाने की संभावना और चार जजों के मीडिया के सामने आने से अलग करके मत देखिए..

मैने पहले भी लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आने के बाद इसके विरोध में राहुल गांधी ने सबसे पहले भाजपा कार्यालय के सामने जाकर अपना विरोध दर्ज कराया था..

लेकिन देखने वाली बात यह है कि एससी/एसटी एक्ट का जो हालिया फैसला आया है.. उसे किसी मोदी सरकार ने नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने दिया है..

और खत्म तो किया ही नहीं गया है.. केवल तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई है..

इसके बावजूद कैबिनेट मिनिस्टर रामदास अठावले ने पहले ही दिन कह दिया था कि सरकार इस फैसले पर विचार करने के लिए कोर्ट में दोबारा अपील करेगी.. और अब तक की मिल रही खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार भी कर लिया है..

लेकिन फिर ये सब क्यों और किसलिए किया जा रहा है.. इसे समझने की जरूरत है..

यह सारा प्रकरण न्यायपालिका पर राजनैतिक दवाब बनाए जाने और साल 2019 की जमीन तैयार करने से ज्यादा कुछ नहीं है.. और कौन कांग्रेस या कौन दलित हितैषी?

हकीकत देखी जाए तो देश में कांग्रेस के जितने पूरे सांसद है.. उससे ज्यादा दलित या पिछड़े सांसद तो अकेले भाजपा की ओर से लोकसभा में हैं..

और यूपी में बसपा या सपा के दलित विधायकों की बात करें तो यहां भी भाजपा इनपर भारी है..

लेकिन इसके बावजूद बहुमत की सरकार होते हुए भी जिस तरह भाजपा सरकार ने विपक्ष की राजनैतिक चालों के आगे घूटने टेक दिए..

इसके लिए तो सबसे पहले दलित-सवर्ण के नाम की बकैती कर रहे इनके भक्तों को शर्म से मर जाना चाहिए और फिर इनको झोला उठाकर सरकार से बाहर चले जाना चाहिए..

चलते चलते एक बात और बता दूं कि दलित और पिछड़े भाईयों से पूरी हमदर्दी है और वास्तव में जो अभावों से ग्रस्त हैं या गरीब हैं.. उनसे उनका न तो हक छिना जाना चाहिए और न ही उत्पीड़न होना चाहिए..

पर यहां भी लग रहा है कि खुद को दलितों या पिछड़ों का हितैषी बताने वाली राजनैतिक पार्टियों के लिए दलितों या पिछड़ों का उत्पीड़न या भागीदारी जैसी बातें तो बाद की बात है..

सबसे बड़ी समस्या चार सालों बंद हो रही इनकी अपनी प्राइवेंट एंड संस राजनैतिक पार्टी की दुकान है..

फिर उसके लिए चाहे देश फूंक दिया जाए.. थाने फूंक दिए जाए.. बच्चों का सर फोड़ दिया जाए, एम्बुलेंस को रास्ता न दिया जाए या रेल की पटरी उखाड़ दी जाए..

लोकतांत्रिक तरीके से कोई विरोध जताए, लड़े या जीते.. इससे लोगों को फर्क नहीं पड़ता, पर हकीकत यह भी है इस तरह के उपद्रवों में किसी नेता का कोई लड़का नहीं मरता..

#भारतबंद_नहीं_हैं.. राजनीति ने इंसान होना ही बंद कर दिया है..

लेख में दिए विचार लेखक के है , कलिदास क्लब का उससे सहमत होना आवश्यक नहीं है 

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