बस इतना समझिये कि आज का भारत बंद मोदी और शाह की पेशानियों पर बल बनने जा रही है – पुष्य मित्र

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खबरें बता रही हैं कि आज पूरा भारत उबल रहा है. दलित और पिछड़े लोग सड़कों पर हैं. तोड़-फोड़ और आगजनी हो रही है, सड़क जाम है, ट्रेनों को रोका जा रहा है. इधर फेसबुक पर लोग कंफ्यूज हैं, यह कैसा बंद है. सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ भी क्या बंदी होती है, आंदोलन किया जा सकता है… लोग तर्क दे रहे हैं कि यह गलत है. यह भी बता रहे हैं कि सरकार खुद इस फैसले के खिलाफ अपील कर रही है. लोगों को अजीब भी लग रहा है कि इस बंदी में आरक्षण खत्म करने की बात कहां से आ गयी, मोदी जी के खिलाफ भी नारे लग रहे हैं. क्या बंदी करने वालों को मालूम नहीं है कि मोदी जी का इसमें कोई हाथ नहीं है.

तर्क-वितर्क हैं, सवाल हैं, कन्फ्यूजन है. कुछ लोग पूरी तरह बंदी के खिलाफ हैं. परेशान हैं. बता रहे हैं कि कैसे एबुलेंस में फंस कर लोगों की मौत हो रही है. जबकि कुछ लोग साफ-साफ लिख रहे हैं कि वे बंदी के समर्थन में हैं, तर्क जाये तेल लेने.

बहरहाल एक पत्रकार के तौर पर मैं इस बंदी को अलग तरीके से देख रहा हूं. यह संभवतः पहला ऐसा मौका है जब लोगों ने मोदी सरकार के खिलाफ ऐसा दमदार प्रदर्शन किया है. जी हां, आप कितना भी कहिये कि फैसला सुप्रीम कोर्ट ने लिया है, बंदी के समर्थक मोदी सरकार का विरोध कर रहे हैं. मोदी के खिलाफ नारे लग रहे हैं. नारे और पोस्टर बता रहे हैं कि मैसेज यह गया है कि मोदी सरकार आरक्षण को खत्म करने वाली है.

एक वह दौर था जब विपक्षी मोदी के पुतले में आग लगाते थे तो पुतले की आग से खुद झुलस जाते थे. दहाई में पहुंच गयी कांग्रेस, बिखरा हुआ विपक्ष और जीत के रथ पर सवार भाजपा यह सब ऐसा समीकरण था कि लोग कहने लगे थे कि 2019 नहीं 2023 की बात कीजिये. ऐसे में अचानक, ऐन चुनाव के पहले भड़का जनाक्रोश सामान्य नहीं है. चेतावनी है. विपक्ष की उस ताकत का प्रतीक है, जो दलितों और पिछड़ों को यह बताने में कामयाब हो गयी है कि मोदी सरकार आरक्षण खत्म करने जा रही है.

अगर आप नहीं भूले हों तो याद कीजिये बिहार का विधानसभा चुनाव, सिर्फ इसी मैसेज के बदले पूरी बाजी पलट गयी थी. मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा के एक बयान ने बीजेपी का बना बनाया खेल खराब कर दिया था. मोदी लाख कहते रह गये, मगर किसी ने भरोसा नहीं किया. भाजपा के बारे में यह आम धारणा है कि वह आरक्षण के खिलाफ है और संघ की खुली नीति है, वह आरक्षण में बड़े पैमाने पर फेर-बदल करना चाहती है.

मोदी और शाह राजनीतिक कारणों से अपने बयान बदलते रहें. मगर संघ के अधिकारी कभी इस मसले पर अपनी राय बदलते नहीं. अपने स्टैंड पर अडिग रहते हैं.

अमूमन मोदी समर्थक जो भक्त के नाम से जाने जाने लगे हैं, का भी पोलिटिकल स्टैंड यही है कि आरक्षण में बदलाव होना चाहिए. या हो सके तो इसे बंद ही कर देना चाहिये. मगर देश के पिछड़े और दलित समुदाय के लोगों के लिए आरक्षण अस्मिता का सवाल है. वे बिल्कुल नहीं चाहते कि इसमें कोई फेरबदल हो, कोई इसे छुए भी. तेजस्वी ने तो हाल ही में आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 70 फीसदी करने की मांग कर दी है. कई दलित-पिछड़ा संगठनों की यह पुरानी मांग है.

तो क्या, आरक्षण अगले चुनाव के लिए बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है. अगर बन गया तो बीजेपी अपना स्टैंड कैसे क्लीयर करेगी. विपक्षी पार्टियों का रुख क्या होगा. ये तमाम सवाल हैं जो आज की बंदी को देखकर मेरे दिमाग में आ रहे हैं. गलत-सही का सवाल भूल जाइये, बस इतना समझिये कि आज की बंदी मोदी और शाह की पेशानियों पर बल बनने जा रही है.

लेख में दिए विचार लेखक के है , कलिदास क्लब का उससे सहमत होना आवश्यक नहीं है 

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