चर्च की असहिष्‍णुता की यह कहानी इसलिए बताना आवश्‍यक है क्‍योंकि पश्‍चिम के इसाई धर्म में धार्मिक ग्रंथ के अनुवाद करने पर भी जिंदा जला दिया जाता था – सोनाली मिश्र

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वह सोचता था अपने मन से, वह विचारता था अपने मन से, उसने बाइबिल को अपने मन से पढ़ना चाहा और चाहा कि उसने जो समझा है वह उसे जनता के सामने लाए! पढ़ा लिखा विलियम टिंंडेल William Tyndale बाइबिल का अंग्रेजी में अनुवाद करना चाहता था।

सोलहवीं शताब्दी में उस समय हेनरी अष्टम का शासन था। उस समय तक बाइबिल का अनुवाद हालांकि Wycliffe के द्वारा हो चुका था, पर वह प्रतिबंधित था, काला बाजार में Wycliffe के द्वारा किया गया अनुवाद उपलब्ध था पर हर कोई उसे खरीद नहीं सकता था। इसलिए William Tyndale ने बाइबिल का अंग्रेजी अनुुवाद करने का फैसला किया। वह जानता था कि वह यह काम कर सकता है पर उसे यह भी पता था कि इतने बड़े काम के लिए उसे पैसे की जरूरत होगी और लंदन में उसकी मदद के लिए कोई नहीं था, यहां तक कि उसका सबसे अच्छा दोस्त लंदन का बिशप Cuthbert Tunstall भी नहीं। चर्च की राजनीति सबसे बढ़कर थी। 

William Tyndale ने जर्मनी का रूख किया। वहां पर उसने बाइबिल का अनुवाद करने का फैसला किया, पर चर्च को यह बात पता चल गया और बाइबिल की प्रिटिंग को रूकवा दिया गया। William Tyndale वहां से भागने में सफल हुआ। यह कहानी आने वाले सालों में कई बार दोहराई गई। पर कुछ सालों में William Tyndale बाइबिल का अनुवाद अपने अनुसार करने में सफल हुआ और चर्च की निगाह में सबसे बड़ा दुश्मन बन गया।

इंग्लैंड व रोम में उसके खिलाफ अभियान छिड़ गया था। वह अपनी जान बचाने के लिए भेष बदल कर रह रहा था। न केवल William Tyndale बल्‍कि उसकी बाइबिल के साथ किसी भी तरह से संबद्ध व्‍यक्‍ति की जान खतरे में थी। इंग्‍लैंड में Thomas Hitton जो कि William Tyndale से युरोप में मिला था, उसे पकड़ा गया और जिंदा जला दिया। Thomas Bilney नामक एक वकील जिस पर William Tyndale के साथ संबंध रखने का शक था, उसे भी जिंदा आग की लपटों में फेंक दिया गया।

William Tyndale के शुरूआती समर्थक रहे Richard Bayfield पर काफी अत्‍याचार किए गए। पर चर्च की सत्‍ता William Tyndale को पकड़ना चाहती थी और दंड देना चाहती थी। काफी आंख मिचौली के बाद 1535 में William Tyndale पकड़ में आया और बाइबिल के अंग्रेजी अनुवाद के अपराध के लिए उसे जिंदा जला दिया गया। 

असहिष्‍णुता की यह कहानी इसलिए बताना आवश्‍यक है क्‍योंकि जहां भारत में जहां एक धार्मिक ग्रथों के अनुवाद व पुर्नपाठ हुआ करते थे, एक के बाद दूसरी स्‍मृतियां लिखी जा रही थीं, न केवल रचनाओं के पुर्नपाठ हुआ करते थे बल्‍कि सहमत न होने पर अपना अलग ग्रंथ ही लिखने की स्‍वतंत्रता थी, वहीं पश्‍चिम के रिलीजन में धार्मिक ग्रंथ के अनुवाद करने पर भी जिंदा जला दिया जाता था। वहीं भारत में अनुवाद या ग्रंथों के पुर्नपाठ पर किसी भी तरह के दंड तक का इतिहास नहीं है। उस सनातन पर असहिष्‍णु होने का आरोप वह लोग लगाते हैं जो William Tyndale जैसे न जाने कितने लोगों को जलाकर अपने रिलीजन को सुप्रीम ठहराते हैं। 

हमारी रामायण जहां गई उसने वहीं का रूप पा लिया, हमारा कृष्‍ण जहां गया वह वहीं का हो गया। राम को कबीर ने अपने हिसाब से लिखा, तुलसी ने अपने और वाल्‍मीकि ने अपने। सूर के भी कृष्‍ण रहे, रसखान के भी, पर कोई लड़ाई नहीं।

पोस्ट सोनाली मिश्र के फेसबुक वाल से 

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