कारवाँ मैगज़ीन का लेख पढ़ा। लेख पीत पत्रकारिता का ज़बरदस्त नमूना है,ऐसे पत्रकारों से दोवाल के बेटे प्राइवट कपैसिटी में निपट लेंगे-नितिन त्रिपाठी

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अजीत दोवाल एक IPS अधिकारी हैं। भारत के सबसे टफ़ कॉम्पटिशन को निकाल बने IPS अधिकारी। फिर IPS अधिकारी के रूप में चालीस वर्ष अजीत दोवाल ने विभिन्न प्रधान मंत्रियों के कार्य काल में देश की सेवा की और सभी के कार्यकाल में उपलब्धियों के झंडे गाड़े। चाहते तो कहीं SSP, IG बन बढ़िया कमा खा रहे होते, लेकिन जोश था जूनून था, स्पेशीऐलिटी चुनी ऐसी की कभी नोर्थ ईस्ट बॉर्डर पर आतंकियों को ठिकाने लगा रहे होते तो कभी हाई जैक हुवे प्लेन को वापिस लाने के लिए आतंकियों से लोहा ले रहे होते। कभी पंजाब में तो कभी पाकिस्तान में घूम घूम कर दोवाल ने अपनी छवि बनाई, देश को अपना जीवन दिया। चाहे इंदिरा गांधी हों या राजीव गांधी, अटल जी हों या गुजराल, सभी के प्रधान मंत्रित्व काल में दोवाल को बड़ी बड़ी ज़िम्मेदारियाँ दी गई और उन्होंने सभी बख़ूबी निभाईं। एक कर्तव्य निष्ठ अधिकारी की तरह।

अजीत दोवाल सुपर कोप थे, मोदी ने उन्हें पहचाना, NSA बनाया, उनकी उपलब्धि रही कि उनके समय में पूरे देश सीमा को छोड़ कहीं कोई आतंकी सर ना उठा पाया। स्लीपर सेल पकड़ी जाने लगीं, प्लानिंग के ही फ़ेस में आतंकी पकड़े जाने लगे, सीमा पार कभी म्यांमार में तो कभी पाकिस्तान में घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक की जाने लगी।

ज़ाहिर सी बात है देश के दुश्मनों को जलन होगी ही। कुछ विपक्ष के नेता/ समर्थक, कुछ मीडिया कर्मी दोवाल के बारे में इस तरह से लिखते हैं जैसे वह चौराहे पर खड़े होने वाले ट्रैफ़िक इन्स्पेक्टर थे और उन्हें मोदी ने NSA बना दिया। ड़ायन भी सात घर छोड़ कर खाती है, शुक्र मनाइए दोवाल का की आज आप और आपके बच्चे देश में सुरक्षित हैं। नहीं तो लखनऊ रेलवे स्टेशन से लेकर मुंबई तक जब मन होता था आतंकी बैंड बजा कर जाते थे।

दोवाल के बेटे भी कोई सड़क छाप रोमीओ नहीं है। उच्च शिक्षा प्राप्त युवा हैं, दासियों साल का नौकरी और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का अनुभव है और यह सब मोदी ने नहीं कराया। यह सब मनमोहन सरकार के समय में हुआ । कारवाँ मैगज़ीन का लेख पढ़ा। लेख पीत पत्रकारिता का ज़बरदस्त नमूना है।

पूरे लेख में कहीं भी एक शब्द ऐसा ना आया कि तहक़ी कात में उनके बेटों ने कोई गड़बड़ की। लेकिन शब्दों का चयन इस तरह से किया गया कि पढ़ने वाले को लगे दोवाल के बेटे, दोवाल के साथ मिल कर फ़्रॉड कर रहे हैं। पहली ही लाइन इस संदर्भ में थी कि दोवाल के बेटे एक विदेश में बनाया हुआ हेज फ़ंड मैनेज करते हैं।

विदेश में हेज फ़ंड मैनेज करना कब से इलीगल हो गया, अधिसंख्य हेज फ़ंड विदेश से ही मैनेज होते हैं। हाँ यदि अवैध पैसे का ट्रैंज़ैक्शन हो तो वह ग़ैर क़ानूनी माना जाएगा। लेकिन वाक्यों का चयन इस तरह से किया गया कि पढ़ने वाले को लगे सब अवैध हो रहा है। कुछ इस तरह से “अजीत दोवाल विदेशों में अवैध छिपाए जा रहे पैसे पर सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे हैं। उनका बेटा एक हेज फ़ंड मैनेज करता है” देखिए यह दो अलग अलग वाक्य हैं, कोई कनेक्शन नहीं। लेकिन साथ साथ लिख देने से ऐसा प्रतीत होता है जैसे दोवाल के बेटे अवैध फ़ंड मैनेज करते हों।

ख़ैर दोवाल के बेटे प्राइवट कपैसिटी में निपट लेंगे ऐसे पत्रकारों से, मुकदम भी कर दिया है। लेकिन दुखद यह है कि गली मुहल्ले के कांग्रेसी नेता, छूटभैय्ये पत्रकार अजीत दोवाल का नाम इस तरह से उपयोग में लाते हैं जैसे वह एक हवलदार हों। शर्मनाक।

Nitin tripathi जी की फेसबुक वाल से

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