शेहला रशीद काल्पनिक ट्वीट करती हैं और देश की कथित बड़े लिबरल पत्रकारों की लॉबी उसे हाथों हाथ लेकर बड़ा मुद्दा बना देती हैं- राजीव रंजन प्रसाद

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कुछ ऐसी खबरें जिन्हें पाकिस्तानी मीडिया ने हाथोहाथ लपका वे भारतीय वामपंथियों द्वारा देश के आक्रोश को विकृत दिशा प्रदान करने के उद्देश्य से फैलायी गयी थीं। पुलवामा प्रकरण में सोश्यल माध्यम पर झूठ फैलाने के लिये कई धरे गये हैं, अनेक पर एफआईआर हुई है। ऐसा ही एक वायरल झूठ बेनकाब होने के पश्चात आदर्श तिवारी ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है – “शेहला रशीद काल्पनिक ट्वीट करती हैं और देश की कथित बड़े लिबरल पत्रकारों की लॉबी उसे हाथों हाथ लेकर बड़ा मुद्दा बना देती हैं। कोई कान नहीं चेक करता बल्कि सभी कौवे के पीछे जानबूझ कर बेशर्मी के साथ दौड़ गए और फर्जी खबर को सही बताने लगे। कुछ शातिर और निष्पक्षता की खाल ओढ़े मीडिया घरों ने स्टोरी भी कर दी। कोई कविता कृष्णन हैं पुरानी तस्वीर ट्वीट कर रहीं, वो इतनी बेशर्म हैं कि उन्हें यह ज्ञात नहीं कि गर्मी के कपड़े और सर्दी के कपड़ों में अंतर भी होता है। कोई पुरानी खबर का स्क्रीनशार्ट देकर बता रहा है कि बड़ी जाति के लोगों ने शहीद का अंतिम संस्कार नहीं होने दिया। इन जातीय पिशाचों की जमात यह नहीं बता रहे कि यह खबर कब की है और उसका अंजाम क्या हुआ?” इस जातिवादी समाचार ने विचलित किया था, परंतु अब मन डर से भर गया है। यह सच्चाई सामने है कि देश को टुकडे टुकडे देखने की नीयत वाले लोग कैसे हमारी सामाजिक दरारों को दिन रात चौडा करने में लगे हुए हैं। सामाजिक असमानतायें एक दु:खद सच्चाई है परंतु किसी भी पुरानी घटना को पुलवामा प्रकरण के साथ जोड कर पूरे घटनाक्रम को षडयंत्रपूर्वक क्या दिशा देने का प्रयास किया जा रहा है, हमें सोचना होगा।

भास्कर में छपा कार्टून जिस पर सोशल मीडिया में विवाद हुआ

पुलवामा प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि अनेक अखबार एजेंडा फैलाने के दोषी पाये गये और जन-आक्रोश का शिकार हुए हैं। कार्टून बहुत ताकतवर विधा है लेकिन अगर उसका प्रयोग वैमनस्य प्रसारित करने के लिये हो, एजेंडा फैलाने के दृष्टिगत किया जाये अथवा साम्प्रदायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये बनाया गया हो तो क्यों भर्त्सना नहीं होनी चाहिये? पुलवामा हमले के विरोध में यदि देश की भावनायें आक्रोशित हैं तो क्या गलत है? परंतु यदि कोई मंसूर कार्टून बना कर पात्र के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास करता है कि आज श्रद्धांजलि देने के लिये मैंने कितनी गाडियाँ फोडीं, तो मान कर चलिये कि वह खिल्ली नहीं उडा रहा बल्कि ऐसा करने के लिये उकसा रहा है। यह समय केवल आक्रोश प्रदर्शन का ही नहीं ठहर कर सोचने-विमर्श करने का भी है। यह वही तबका है जिसने “हिंदू आतंकवाद” शब्द का आविष्कार किया है जिसका हव्वा खडा कर जैश-ए-मोहम्मद और भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा निरंतर की जाने वाली हत्याओं को सही ठहराया जा सके। दंगे कौन फैलाता है उसके लिये महामूर्खों की नौटंकियों को मत देखिये, उनसे कुछ होने का नहीं, आप वामपंथियों के लिखे पर और उनसे सम्बद्ध पत्रिकाओं/अखबारों/पोर्टलों बारीक दृष्टि बनाये रखिये। स्वयं देखिये कि जब को शहादत और पाकिस्तान चीख रहे हैं वे कौन लोग हैं जो जाति और धर्म का जहर अपने शब्दों, अपनी हैडलाईनों और अपने कार्टूनों से परोस रहे हैं।

-राजीव रंजन प्रसाद

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