राम जन्मभूमि मंदिर – हिंदू समाज का धैर्य अब खत्म होता जा रहा है : कमल कुमार सिंह

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कमल कुमार सिंह I सुप्रीम कोर्ट के महान जजो के लिए भले ही श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का मामला महत्वपूर्ण न हो. लेकिन, देश के करोड़ो हिंदू के लिए ये एक मुख्य मुद्दा है. जिसकी चर्चा हर घऱ में हो रही है. लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निराश हैं. कोर्ट भले ही इसे प्रार्थमिकता न दे लेकिन सारे राजनीतिक दलों के लिए ये अहम मुद्दा है. हकीकत ये है कि देश में 2019 चुनाव के बाद किस पार्टी की सरकार होगी ये भी इसी मामले से तय होना है. विपक्ष सरकार से मंदिर कब बनेगा उसकी तारीख पूछते हैं. विलंब सरकार की तरफ से नहीं बल्कि अड़ंगा तो कोर्ट लगा रही है. सुप्रीम कोर्ट में इस मामला को आए 8 साल बीत चुके हैं. आठ साल में अब तक ये भी तय नहीं हो पाया है कि इस मामले को सुनने वाले बेंच का प्रारूप कैसा होगा? आज कोर्ट ने देश की जनता को बताया कि जनवरी 2019 में तय होगा कि कौन कौन जज इस केस को सुनेंगे. इसकी सुनवाई कैसे होगी? इसकी सुनवाई हर दिन होगी या तारीख पर तारीख लगेगी ..ये सब बाद में तय होगा. इस मामले को कोर्ट ने लटका रखा है लेकिन विडंबना ये है कि लोग मोदी सरकार से पूछ रहे हैं कि मंदिर कब बनेगा? लोगों को लगता है कि सरकार ने इस मामले ठीक से हैंडिल नहीं किया.

हकीकत ये है कि कोर्ट अपने ही फैसले से पलट गई. 4 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने तय किया था कि 11 अगस्त 2017 से इस मामले की रोजाना सुनवाई होगी. सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच रोजाना दोपहर 2 बजे से सुनवाई करेगी. लेकिन बीच में कोर्ट की तरफ से एक अव्यवहारिक प्रस्ताव आया. कोर्ट ने इसे धर्म और आस्था से जुड़ा मामला बताते हुए पक्षकारों से आपसी बातचीत के जरिए इसका हल निकालने को कहा था. साथ में कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो कोर्ट मध्यस्थता कर सकता है. अगर हिंदू और मुस्लिम पक्ष आपस में ही मामले को सुलझाने की स्थिति में होते तो कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाते? इससे तो यही लगता है कि कोर्ट इस मामले पर कुछ भी फैसला देने से बच रही है. शायद कोर्ट चाहती है कि सरकार ही इसका हल निकाले. लेकिन ये विवाद अगर सिर्फ जमीन का होता तो शायद कोई रास्ता निकल भी सकता था. ये मामला तो आस्था से जुड़ा है. हिंदुस्तान की सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ा है और तो और ये राजनीति का भी एक अहम हिस्सा है.

तीन तीन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं. हर दिन इस मसले पर टीवी पर बहस होती है. धार्मिक संगठनों के द्वारा भावनाएं भड़काई जाती है. इसके बावजूद सर्वोच्च अदालत इस मामले को टालना क्यों चाहती है ये तो इसके जज ही बता सकते हैं. समस्या ये है कि जज साहेबान तो वजह बताने के लिए किसी के प्रति जिम्मेदार हैं नहीं. जनता के प्रति भी उनका कोई दायित्व भी नहीं है. न कोई आरटीआई डाल सकता है. न ही इसकी सुनवाई कैमरे पर होती है जिसे देख कर कुछ समझा जा सके. पारदर्शिता के नाम की कोई चीज भी नहीं है. अदालत से तो सिर्फ फरमान जारी होता है. पहले सबरीमाला और अब अयोध्या के केस को टालने के बाद देश में अचानक से जो महौल पैदा हुआ है उसमें अगर कहीं दंगा भड़क जाए.. हिंसक झड़पें होने लगे.. राजनीतिक हिंसा होने लगे… तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज देश में वातावरण खऱाब होने की जिम्मेदारी लेंगे? न्याय करने वाले जब जमीनी हकीकत से नावाकिफ होना खतरनाक हो सकता है. सबरीमाला में जिस तरह से कोर्ट के आदेश लागू नहीं हो पाए उससे शायद किसी ने कुछ सीखा नहीं है.

अयोध्या मामले में वो सब हो रहा है जो पहले कभी नहीं हुआ था. कोर्ट के फैसले के बाद रामजन्मभूमि न्यास के सदस्य और भाजपा के पूर्व सांसद रामविलास वेदांती का विवादित बयान सामने आया. उन्होंने सीधे तौर पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर कांग्रेस से मिले होने का आरोप लगाया. इतना तक कहा कि कोर्ट ने कपिल सिब्बल के इशारे पर मामले को टाला है. उन्होंने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर भी आरोप लगाए. सोशल मीडिया का तो और भी बुरा हाल है. जस्टिस राजन गोगोई के पिता केशव चंद्र गोगोई को भी इस मामले में घसीटा जा रहा है. वो कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता रहे. 1982 में वो असम के मुख्यमंत्री भी बने. कई लोग चीफ जस्टिस के कांग्रेस कनेक्शन पर तनकीद कर रहे हैं. ये आरोप लगा रहे हैं कि वो इस मामले को लोकसभा चुनाव के बाद तक लटकाना चाहते हैं. हांलांकि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं है लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों के मुंह पर ताला तो नहीं लगाया जा सकता न ही इतने सारे लोगों पर अवमानना का आरोप लगा कर जेल में बंद किया जा सकता है. क्योंकि लोग तार्किक सवाल पूछ रहे हैं कि अगर कोर्ट एक आंतकवादी के लिए रात में खुल सकती है. फोन पर तीस्ता शीतलवाड़ को बेल दिया जा सकता है. आधार, ट्रिपल तलाक, सबरीमाला जैसे मामले को साल दो साल में निपटाया जा सकता है तो रामजन्मभूमि मामला 8 साल तक क्यों लटकाया गया?

समझने वाली बात ये है कि ये एक रिव्यू पिटीशन है. 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय इस मामले में फैसला सुना चुकी है. ये तय चुका है कि जिस जगह पर विवादित ढांचा था वही श्रीराम का जन्म हुआ था. विवाद जमीन को रामजन्मभूमि घोषित किया जा चुका है. न्यायालय ने विवादित भूमि हिंदू गुटों को देने का आदेश दिया था. न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा. न्यायालय ने यह भी पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा. दो न्यायधीधों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद ये मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा है. अब न तो तफ्तीश होनी है. न ही कोई एसआईटी का गठन होना है. न ही कोई कमेटी बननी है. सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ और सिर्फ ये परखना है कि हाईकोर्ट ने जिस आधार पर ये फैसला दिया वो कानून संगत है या नहीं. लेकिन पता नहीं क्यों ये मामला 8 साल से घसीटा जा रहा है. मामले को टालने की कोई साजिश हो रही है या फिर ये मान लिया जाए कि हमारे देश में अदालत का ये काम करने का तरीका है.

रामजन्मभूमि विवाद का सबसे अहम पहलू ये है कि मुस्लिम पक्ष शुरु से ये दावा करता रहा कि जिस जगह पर विवादित ढांचा था वहां कभी कोई मंदिर था ही नहीं. न कोई मंदिर तोड़ा गया न ही वहां राम के जन्म के प्रमाण है. वैसे भी सेकुलर पार्टियां श्रीराम को एक मिथक मानते रहे. यूपीए सरकार ने रामसेतू के मामले में कोर्ट में हलफनामा देकर ये कहा था कि राम एक मिथक है, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है. इतना ही नहीं, रामजन्मभूमि विवाद में 1995 में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने ये हलफनामा दिया था कि अगर विवादित ढांचा के नीचे अगर मंदिर के निशान मिले तो वो अपना सारा क्लेम वापस ले लेंगे. इलाहाबाद हाइकोर्ट ने विवादढांचा के नीचे खुदाई करने के आदेश दिए. हिंदू और मुस्लिम पक्ष की मौजूदगी में खुदाई हुई और जमीन के अंदर से सिर्फ और सिर्फ रामजन्मभूमि मंदिर के अवशेष मिले. खुदाई करने वाले दल के लीडर देश के जाने माने आर्कियोलॉडिस्ट के के मुहम्मद थे. वो एक मुस्लिम हैं, फिर भी उन्होंने अपने रिपोर्ट में कहा कि विवादित ढांचा .. मंदिर को तोड़ कर उसके मलबे पर बनाया गया था. अगर ये जगह किसी प्रोफेट या जीसस की जन्मस्थली होती तो क्या यहां कोई मंदिर बनाने की सोच सकता था? भारत में हिंदुओं के धैर्य की परीक्षा कब तक चलेगी? राम के जन्म स्थान पर राम का मंदिर नहीं होगा तो क्या वहां चर्च या मस्जिद होंगे? अच्छा तो ये होता कि खुदाई में सबूत निकलने के बाद मुस्लिम पक्ष विवादित जमीन पर से अपने दावे को वापस ले लेता. मामला खत्म हो गया होता. लेकिन इस मामले को कांग्रेस और दूसरी तथाकथित सेकुलर पार्टियों ने वोटबैंक के लिए जिंदा रखा.

जनेऊधारी शिवभक्त मंदिर मंदिर घूम तो जरूर रहे हैं लेकिन राम जन्मभूमि मंदिर पर एक भी बयान नहीं दिया है. जो लोग सरकार से मंदिर बनाने की तारीख मांग रहे थे. उन्हें अब कोर्ट से पूछना चाहिए. लेकिन राजनीति का चरित्र ही ऐसा है कि आदमी सोचता कुछ है. बोलता कुछ है और करता कुछ है. हिंदू समाज का धैर्य अब खत्म होता जा रहा है. आम लोगों को कोर्ट और जजों की बाते पल्ले नहीं पड़ती. उन्हें अब अयोध्या में भव्य रामजन्मभूमि मंदिर चाहिए. जिसके लिए उन्होंने नरेंद्र मोदी को वोट दिया था. बीजेपी के लिए ये वक्त राजनीति का नहीं, एक्शन का है. कानून लाएं.. अध्यादेश लाएं और एक भव्य राम मंदिर बनाने की राह प्रशस्त करें. क्योंकि ये अब साफ हो गया है कि कोर्ट से इस मामले में न्याय नहीं मिलने वाला है. अगर न्याय मिला भी तो काफी देर हो जाएगी. मोदी सरकार अगर अध्यादेश या कानून बना कर मंदिर बनाती है तो इससे दो फायदे होंगे. देश को ये भी पता चला जाएगा कि कौन कौन राम मंदिर के विरोध में है. और कौन नकली रामभक्त.

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