जहाँ तक करकरे का प्रश्न है, निःसंदेह उसने वीरगति प्राप्त की जिसके लिये उसे राजकीय सम्मान मिला। लेकिन इससे किसी के पृथ्वी पर किये गये कर्म आलोचना विवेचना से परे नहीं हो जाते- देवेन्द्र सिकरवार

0
71
views

भारत में यूँ तो बहुत महँगाई है, बहुत ग़रीबी है लेकिन एक चीज बहुत सस्ती है और इफ़रात से मिलती है और वह है #शहीद_का_रुतबा।और बात केवल यहीं नहीं रुक जाती है बल्कि हमने शहीदों का वर्गीकरण भी अपनी सुविधानुसार कर लिया है- “ये तेरा वाला शहीद, ये मेरा वाला शहीद।”

बेहतर हो कि शहीदी का मतलब समझ लिया जाये। शहीद वास्तव में एक इस्लामिक शब्द और इस्लामिक अवधारणा है जिसके अनुसार इस्लाम के लिये जो भी मारा जाये या नष्ट हो वह ‘शहीद’ है और इसीलिये बुरहान वानी और ओसामा बिन लादेन जैसे इंसानी नस्ल से लेकर जुलज़नाह जैसे घोड़े और यहाँ तककि बाबरी मस्जिद जैसी निर्जीव इमारत भी इनके लिये ‘शहीद’ का रूतबा रखती है।

जहाँ तक भारतीय परंपरा का प्रश्न है यहाँ तीन शब्द प्रचलित हैं-

१- वीरगति
२- बलिदान
३- हुतात्मा

– किसी युद्ध में युद्धरत अवस्था में मृत्यु को प्राप्त हो जाना ‘वीरगति’ है।
– व्यक्ति, परिवार और समाज कल्याण के निमित्त अपने प्राणप्यारी वस्तु या प्राणों का त्याग ‘बलिदान’ है।
-राष्ट्र या धर्म के लिये सोच समझकर मृत्यु का वरण करने वाला ‘हुतात्मा’ कहलाता है।

जहाँ तक करकरे का प्रश्न है, निःसंदेह उसने वीरगति प्राप्त की जिसके लिये उसे राजकीय सम्मान मिला।

लेकिन इससे किसी के पृथ्वी पर किये गये कर्म आलोचना विवेचना से परे नहीं हो जाते।

क्या वीरगति प्राप्त रावण को समाज क्षमा कर पाया?
क्या वीरगति प्राप्त दुशासन को समाज क्षमा कर पाया?
क्या वीरगति प्राप्त दुर्योधन को समाज क्षमा कर पाया?

चलिये वर्तमान में एक उदाहरण देखते हैं। सभी जानते और मानते हैं कि पंजाब में पृथकतावादी राष्ट्रद्रोही ख़ालिस्तानी आंदोलन को कुचलने वाले सुपरकॉप के पी एस गिल राष्ट्र के हीरो थे लेकिन उनकी यह कीर्ति क्या रूपन देओल बजाज के साथ की गयी अश्लील हरक़त को ढाँक सकी?

सारे राष्ट्रवादियों के लिये मेजर गोगोई एक हीरो थे लेकिन क्या उनकी देशभक्ति ने उनकी स्त्रीलिप्सा के वशीभूत होकर हनीट्रैप में फँसते फँसते बच जाने पर भी दंड से बचा पाई?

क्या इंदिरागांधी के भिंडरावाले को पालने पोसने और पाकिस्तान के ९३००० सैनिकों को बिना शर्त भेजने को सिर्फ़ इसलिये अनुल्लेखित व अनिंदित छोड़ दें कि वह तथाकथित रूप से शहीद हुई थीं?

तो क्या किसी पुलिस अधिकारी के घृणित कृत्यों को केवल इसलिये अनदेखा कर दिया जाना चाहिये कि वह अपनी शेखी और असावधानी में अपने राजनैतिक आकाओं द्वारा बिछाई गई शतरंज की बाजी के अजमल कसाब नामक प्यादे का शिकार हो गया?

हाँ, मेरा स्पष्ट आरोप है कि मुंबई हमला विदेशी इटैलियन महिला और उसकी मंडली तथा हाफ़िज़ सईद व आइ एस आइ के बीच अपवित्र व राष्ट्रद्रोही गठबंधन का परिणाम था जिसमें मणिशंकर अय्यर ने दूत का काम किया और मुंबई के स्थानीय मुस्लिमों ने आतंकवादियों को जगह व ओट प्रदान की।

स्क्रिप्ट पूरी तरह तैयार थी। हाथ पर कलावा बांधे अजमल कसाब को संघ का कार्यकर्ता सिद्ध किया जाना था और करकरे को बलि का बकरा बनाया जाना था। #अज़ीज़_बर्नी अपनी किताब ‘हिंदू टैरर’ के साथ एकदम तैयार था। बस अजमल कसाब द्वारा करकरे की हत्या और फिर कसाब की मृत्यु के रूप में अंतिम अध्याय लिखना बाक़ी था।वरना इतने कम समय में कोई इतने आँकड़े इकट्ठे कर ही नहीं सकता था।

लेकिन बस एक गड़बड़ हो गयी। हवलदार तुकाराम जैसे ईमानदार व बहादुर कांस्टेबल को इस षड्यन्त्र का कुछ पता नहीं था और उन्होंने अपना बलिदान देकर भी कसाब को पकड़ लिया और षड्यन्त्र उस इच्छित परिणाम को प्राप्त ना कर सका और ना सिद्ध हो सका “हिंदू आतंकवाद” को। हालाँकि दिग्विजय जैसे ढीठ ने बर्नी की किताब का विमोचन कर अपने षड्यंत्र को पूरा करने की जीतोड़ कोशिश की और इसमें पूर्व में सहभागी था हेमंत करकरे जो असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी रूप से दिग्विजय को रिपोर्ट करता था।

उसने येन केन प्रकरण, जैसे भी संभव हो साध्वी प्रज्ञा को अपराधी सिद्ध कर हिंदू आतंकवाद की काल्पनिक अवधारणा को सिद्ध करने अपने राजनैतिक आकाओं को ख़ुश रखने की ठान रखी थी जो कि उसने सुरक्षा आयोग के एक सदस्य से अपनी बातचीत में ज़ाहिर भी किया था।

इस प्रक्रिया में उसने न्यूनतम मानवीय व क़ानूनी नियमों को ताक पर रखकर साध्वी प्रज्ञा पर अत्याचारों के पहाड़ तोड़े। उसके पालतू परमवीर जो अब पुलिस कमिश्नर बन गया है, सहित कई पुलिस अधिकारियों ने दिन रात बेरहमी से पिटाई की, गुंडों के साथ बंद रखा, माँस-मछली खिलाकर उनकी धार्मिक आस्था को तोड़ने की कोशिश की, पोर्न फ़िल्में दिखाने की कोशिश कर उनके संन्यास को भंग करने की कोशिश करने का पाप किया।

पॉलीग्राफ टैस्ट, नार्को टैस्ट के बाद भी कुछ ना मिलने पर अदालत में साध्वी की योगशक्ति का रोना रोने पर अदालत की फटकार खाई पर चार्जशीट तक तैयार ना कर सके।

साध्वी पर हेमंत करकरे के बेइंतिहा ज़ुल्मों की दास्तान और उसके पापों की लिस्ट इतनी लंबी है कि अगर कृष्ण आज के युग में होते तो इस पापी का कुटिल सिर बहुत पहले ही धड़ से अलग कर चुके होते और इसे वीरगति का सम्मान ना मिलता।

हाँ, वह शहीद हो सकता है लेकिन उन भावुक मूर्ख हिंदुओं के लिये जिन्हें शहीद और वीरगति में अंतर नहीं पता और ना पता है उसके कुकर्मों का।

हाँ, वह शहीद हो सकता है लेकिन उन धूर्त सैक्यूलर व हिंदूद्रोही राजनेताओं व बुद्धिजीवियों के लिये जिन्हें स्व. मोहनचंद्र शर्मा में उन मुस्लिमों का क़ातिल नज़र आता है जिनके लिये उनकी इटैलियन मालकिन जार जार आँसू बहाती है। इसीलिये इस विदेशी औरत के राजीव त्यागी जैसे पालतू कुक़ुर छाती पीटते हैं कि करकरे ने साध्वी प्रज्ञा को गोली क्यों नहीं मार दी।

हाँ, वह शहीद हो सकता है लेकिन राष्ट्रद्रोही मुसलमानों के लिये क्योंकि वह अपने आकाओं के इशारे पर मुस्लिमों के माथे से आतंकवादी का लेबल निकालकर हिंदुओं के माथे पर चिपकाना चाहता था।

हाँ, करकरे को वीरगति मिली जिसका वह क़तई अधिकारी नहीं था लेकिन साध्वी प्रज्ञा के रूप में एक मासूम और निर्दोष स्त्रीसंत की आहें उसका व उसके परिवार का पीछा करती रहेंगी।

देवेन्द्र सिकरवार

लेख में दिए विचार लेखक के है कालिदास क्लब का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

"कालिदास क्लब  "पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से "कालिदास क्लब के संचालन में योगदान दें।