चंदन की मौत की ख़बर से मीडिया और और फेसबुक पर छटपटाहट नहीं है : आदर्श तिवारी

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विशेष समुदाय,गुटों आदि को लिखने का अब कोई औचित्य नहीं है। मीडिया भी जब हिन्दू मरता है तो उसकी जाति व धर्म को छुपा लेती है। साम्प्रदायिक हिंसा बता कर खबर इतिश्री ।इधर मुस्लिम के साथ कुछ हुआ तो मुस्लिम की हत्या ,हिंदूवादी संगठनों का उपद्रव,देश पाकिस्तान बन रहा मीडिया यही खबर लिखती,चलाती है (किसी को डाउट लगे तो स्क्रीन शॉर्ट है) कासगंज की ख़बर पर भी सभी मीडिया की वेबसाइट पर जाइये और देखिये।चंदन से फेसबुक पर छटपटाहट नहीं है, देश पाकिस्तान भी नहीं बन रहा ।ऊपर से हास्यास्पद यह है कि देश में मुसलमान डरे हुए हैं।मीडिया का यह शातिर रवैया दलितों से जुड़ी खबरों में भी आप आसानी से देख सकते हैं।यह एक किस्म का खतरनाक शातिरपना है,जो जानबूझकर लोगों को उकसाने के प्रयास से होता है। आज तक कोई हेडलाइन आपने नहीं देखी होगी कि दबंग दलितों ने मचाया उपद्रव।क्या देश मे दलित उग्र व दबंग कहीं नहीं होते ?सवर्ण दबंग शब्द इस्तेमाल करने में महारथी पत्रकार अब तो दलित से हिंदुओं से टकराव तक कि खबर लिखने में शर्माते नहीं है।एक युवक की आत्महत्या की ख़बर लिखने में भी यह शातिर लोग बाज़ नहीं आते।बानगी देखिये मुस्लिम युवक ने की खुदकुशी, दलित युवक ने कि खुदकुशी।सब लिख दिए किन्तु यह पत्रकार ओबीसी,सवर्ण युवक कभी क्यों नही लिखते ? विज्ञापन के बाज़ार में जहर का कारोबार,ख़बर के नैतिक दृष्टिकोण का ह्यास दुखित करता है।अगर सभी घटना को हिन्दू,मुस्लिम,सवर्ण, दलित से इतर ख़बर के नज़रिए से नहीं देखा जा सकता ? अथवा आज दलित, मुस्लिम बिकाऊ है कारोबार में ज्यादा हीट वाला लाभ दे रहा ? समाज की हिंसा को अलग-अलग बाटकर रोटी पचेगी ?

आदर्श तिवारी

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