कुम्भ का ऐतिहासिक दर्शन और मेरा विचार : दीपक पाण्डेय

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दीपक पाण्डेय I आजकल तो कुंभ/माघमेले में जाने के लिए तमाम तरह के ट्रांसपोर्ट विकल्पों का उपयोग किया जाता है.. लेकिन बड़े बुजुर्ग बताते थे कि कुंभ में पर पहले लोग पैदल या बैलगाड़ियों से आते थे और फिर लम्बे समय तक रहते थे…
आज तो यहां पर रूकने वाले व्यक्तियों में दो प्रतिशत भी लोग नहीं है.. और पैदल भ्रमण करते हुए आना तो अब बहुत पुरानी बात हो चूकी है..

साधु-संत तो अपने डेरों से साल भर पहले निकल पड़ते थे.. वे रास्ते में पड़ने वाले गांव और नगरों में कुछ-कुछ दिन ठहरते थे.. पर इस अवसर का उपयोग सामाजिक समस्याओं के बारे में चिंतन और मंथन पर भी होता था..
मेले में कई महत्वपूर्ण निर्णयों की भी लेने की परंपरा थी.. इस तरह आते-जाते लाखों लोगों से लोगों की भेंट होती थी और कुंभ में हुए निर्णय पूरे देश में फैल जाते थे..

ये प्रक्रिया हर छठे और फिर बारहवें साल में होती थी.. हमारी जानकारी तक में शादी विवाह माघ मेले में तय हुए हैं… और अब भी नाते रिश्तेदारों का एक साथ एक ही जगह पर मिलना मेले में ही हो पाता है..
वर्ना आज के जमाने में कब कहां कौन किस कार्य में व्यस्त है.. और देश के कोने में है.. कुछ भी तय नहीं होता है..

हम तो मेले के माध्यम से अपने ऐसे ऐसे रिश्तेदारों से मिले हैं.. जिनके घर मैं आज तक भी नहीं गया हूं… लेकिन मिलना सबसे हो जाता है..
मतलब रिश्तेदार के रिश्तेदार और उनके भी रिश्तेदार.. दोस्त यार और उनके भी दोस्त यार.. गांव वाले, शहर वाले आप यकीन नहीं कर सकते… घर से आफिस और आफिस से घर वाले इस दौर में यह बाते कितना मायने रखती हैं..
पहले मोबाइल वगैर तो था नहीं तो किसी व्यक्ति से संपर्क साधने में पंडा और उनका झंडा व्यक्ति से संपर्क साधने में काफी मदद करते थे..
मतलब कौन व्यक्ति किस पंडे के तंबू में होगा.. यह पहले से तय होता है.. और पंडे के पास अमुक व्यक्ति का पूरा इतिहास मौजूद होता है..

यह सब पीढ़ी दर पीढ़ी होता है.. और एक ही पंडे के यहां उसके दादा बाबा से लेकर स्वयम वह तक कल्पवास कर रहा होता है.. पहले इस अवसर पर इन सभी जगहों पर हर तरफ फूस की झोपड़ियां ही दिखती थीं…

लेकिन अब इधर कई सालों से आधुनिक सुविधाओं से युक्त टेंट सिटी बसनी शुरू गई है. गैस, बत्ती की जगह लाखों बल्बों से गंगा-जमुन का प्रवाह झिलमिल हो जाता है..

कभी सरकारों की भूमिका इसकी व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से चलाने तक ही सीमित होती थी, अब सरकारें इसके तमाम आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं..

अंग्रेजी सरकार में भी कुंभ के किस्से काफी सुनने को मिलते हैं.. इसलिए इतिहास के आइने से भी आइए इसके बारे में पढ़ते हैं…

बात तब की है जब धुरी राष्ट्र और मित्र राष्ट्रों के बीच युद्ध का निर्णायक समय था… यूरोप, अफ्रीका, एशिया, जापान और अमेरिका तक युद्ध से भीषण तबाही करने वाली आग लगातार फैल रही थी..
ब्रिटिश सरकार ने साफ कह दिया था कि वह प्रयाग कुंभ में इस बार कोई व्यवस्था नहीं कर सकती.. युद्ध ही उसकी प्राथमिकता थी और उसी युद्ध की वजह से कई संकट भी खड़े दिख रहे थे..

उस जमाने में लोहे की इतनी कमी थी कि व्यवसायी बबूल के कांटे को रंगकर उसे पिन बनाकर बेचते थे.. कपड़ा और अनाज राशन की दुकान पर मिलते थे, जहां उनके लिए लंबी लाइनें लगती थीं.. वह तरह-तरह की खबरों, अफवाहों और आशंकाओं का दौर था..

ऐसी विषम परिस्थितियों में तीर्थयात्रियों का प्रयाग कुंभ में शामिल होना बहुत कठिन था.. लेकिन मकर संक्रांति से पहले भीड़ चारों दिशाओं से आने लगी..

तत्कालीन ओटीआर (अवध त्रिभुत रेलवे), बीएनडब्ल्यूआर (बंगाल नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे) और ईआईआर की रेलवे लाइनों के किनारे पैदल चलते लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम प्रयाग में उमड़ने लगा..

सिर पर गठरी, गठरी में अनाज, मुख में जय, जय, जय प्रयागराज महाराज, तीर्थ की शान कहाने वाले गंग-जमुन की बरुई रेत मा मइया ने हिंगोले घलाय मा जैसे लोकगीतों का गायन करते ऊर्जा, स्फूर्ति पाकर और थकान को बिसारकर तीर्थयात्री संगम में डुबकी लगाने के लिए इकट्ठे हुए, तो अंगरेज अफसर इन तीर्थयात्रियों को विस्मय से देखते रह गए..

जल्द ही तकरीबन पूरे देश से ही लोग वहां जुट गए.. पेशावर और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से आने वाले तीर्थयात्रियों की वेशभूषा सबसे अलग थी.. लेकिन उनकी भावना सनातन परंपरा से जुड़ी हुई थी.. उन दिनों पेट्रोल की कमी थी..

लॉरियों के पीछे कोयले और पानी की टंकी लगाई जाती थी.. भाप के ईंधन से लॉरियां चलती थीं.. जीटी रोड जैसी बड़ी सड़कें ज्यादा नहीं थीं.. इसलिए आस्था से लबरेज तीर्थयात्री रेलवे लाइन के किनारे-किनारे चलकर संगम सिंहासन के सामने हाजिरी देने और श्रद्धा प्रकट करने के लिए आए थे..
इन श्रद्धालुओं को देखने की उत्सुकता भी कम नहीं थी.. अंगरेज अधिकारियों और उनकी पत्नियों का हाथी पर सवार होकर मेला क्षेत्र का अवलोकन करना भी एक खास नजारा बन जाता था..

श्रद्धालु नंगे पैर, नंगे सिर पर गठरी रखकर जयकारा लगाते हुए संगम की ओर जाते थे.. इस मौके पर पहुंचे अंगरेजों के पास मेले के विहंगम दृश्य को देखने के लिए दूरबीन होती थी.. पर तीर्थयात्री उनकी ओर गौर नहीं करते थे.. उन्हें तो सम्राटों के सम्राट तीर्थ मुकुट वेणीमाधव के दर्शन की कामना होती थी..

अविभाजित भारत की आबादी उस समय लगभग 40 करोड़ थी.. अफगानिस्तान की राजधानी काबुल और हिंद के व्यवसायी तब हर जगह सम्मान की नजरों से देखे जाते थे…

वे भी प्रयागराज की महिमा से उसी तरह जुड़े थे, जैसे अन्य राज्यों से आए आस्थावान, श्रद्धालु होते हैं.. कुंभ मेला क्षेत्र में विविधता में एकता की भावना साकार होती दिखती था…

विविधता का वह रूप किसी राजनीति या विचार से नहीं उपजा था, वह हमारी परंपरा के विस्तार को बताने वाला था.. यह भावना हमारे संतों, अध्यात्म चिंतकों, मनीषियों की देन है..

कुंभ सदियों से सूचना संचार का सशक्त माध्यम रहा है.. उसके लिए किसी को निमंत्रण नहीं दिया जाता, किसी को बुलाया नहीं जाता, कुंभ के आयोजन में जाने के लिए न कोई प्रचार-प्रसार होता है और न अभियान चलता है..
बल्कि पंचांग में जो तिथि छपती है, श्रद्धालु उसे पढ़-समझकर कुंभ पर्व पर खिंचे चले आते हैं… वे सत्संग की प्रेरणा और सरोकार को ग्रामवासियों तक पहुंचा देते हैं… यह सनातन परंपरा सदियों से चली आई है, और अनंत काल तक चलती रहेगी…

मकर संक्रांति की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं.. आपका जीवन मंगलमय हो..

लेखक स्वतंत्र पत्रकार है

 

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