लखनऊ में लिटरेरी उत्सव सिर्फ बुधिजीवियो के मानसिक भोजन का खेलतो नहीं जिसे किसी के काले धन के बलबूते चलाया जा रहा है – आशु भटनागर

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लखनऊ में लिटरेरी उत्सव में संघियों ने व्यवधान डाल दिया, लेकिन भाई मुझे ये बताओ इस उत्सव का फंडिंग करने वाला कौन था , जबकि कुछ दिन पूर्व ही जागरण ने भी ३ दिन का एक कार्यक्रम लगभग ऐसे ही किया था I

कहीं ऐसा तो नहीं की  संघ और वामियो के बीच की लड़ाई तो नहीं जिसमे हम बेकार ही घुसे जा रहे है

किसी भी तरह के महोत्सव में २० से ३० लाख रूपए तक खर्च हो जाना आम बात है और अगर नाम बहुत बड़े हो तो ये रकम और भी बढ़ जाए
जब सब ओर मंदी है, नोटबंदी है  और सब GST के मारे हुए है तो इस कार्यक्रम के बचाव में आये हुए लोग मुझे सिर्फ इतना बता दें की इसका खर्चा कितना था और कहाँ से मैनेज हुआ
क्योंकि अगर जनता के पास पैसा, नहीं , गरीबो के लिए इलाज नहीं , बच्चो के लिए स्कुल नहीं तो ऐसे महोत्सव क्या गरीबी के देश में गाली नहीं नहीं या फिर ये सिर्फ बुधिजीवियो के मानसिक भोजन का खेल जिसे किसी के काले धन के बलबूते चलाया जा रहा है

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