सोशल मीडिया पर राजनीती और मीडिया झूठ का पर्दा या सच की अनदेखी- दिनकर श्रीवास्तव

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लोकतंत्र में कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें कोई बोलना नही चाहता और कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें कोई सुनना नही चाहता। कुछ वादे ऐसे हैं जिन्हें कोई पूरा नही करना चाहता और कुछ वादे ऐसे हैं जिन्हें कोई करना ही नही चाहता।हमारी लोकतान्त्रिक राजनीति में ये बातें बखूबी देखने को मिलती हैं।अब देखिये घनघोर मुस्लिम आतंकवाद के बीच अचानक किसी को हिन्दू आतंकवाद भी नजर आने लगता है,जांच एन.आई.ए. के हाथ में रही।अब जबकि 11 साल बाद फैसला आया तो आरोपों की ऐसी झड़ी है कि पूछो मत, पता नही तब दबाव में थी एन.आई.ए. या अब दबाव में है, कौन साबित करेगा? केस मज़बूरी में बना था या केस कमजोर ही बनाया गया था, भरोसा क्यों उठने को तैयार बैठा रहता है,कभी किसी पर से तो कभी किसी पर से।आखिर क्यों?

कोई निर्दोष छूट जाता है तो भरोसा नही, कोई फांसी की सजा पाता है तो भरोसा नही, आधी रात कोर्ट खुलवा दी जाती है। जनता ठगी सी देखती रहती है। सी.बी.आई. को सरकार का तोता बताया जाता है. एन.आई.ए. पर भरोसा नही, कोर्ट पर भी भरोसा नही। हम किसके भरोसे हैं,हमारा भरोसा क्यों खो गया? दिन ब दिन क्यों खोता जा रहा चंद जिम्मेदार लोगों की वजहों से।

आखिर हम किसके भरोसे हैं? और हम ऐसे क्यों हैं और ऐसे क्यों होते जा रहे हैं? हम राजनीति क्यों कर रहे हैं जबकि हम न नेता हैं और न हमें चुनाव लड़ने की ख्वाहिश ही है, लेकिन हम सब राजनीति न करते हुए भी राजनीति का शिकार हैं।

जिन्हें पूर्ण बहुमत की कभी सत्ता नही मिली वह मिलने पर सबकुछ बदलकर रख देने का वायदा करते हैं।जिन्होंने पूर्ण बहुमत अबहुमत सहमत से सालों साल सत्ता चलाई वह फिर वायदों कि झड़ी के साथ अपनी जादुई छड़ी हमारे माथे पर फेर रहे हैं। हम जनता हैं ये जानना चाहते हैं कि आपको कब सजा मिलेगी अपने वादे पूरे न करने की? आप दोनों या फिर आप सभी झूठ बोलकर ही सत्ता में क्यों आना चाहते हो? अपनी तनख्वाह बढ़ानी हो या फिर पेंशन पानी हो तो सब एकसाथ ताली बजाते हो, भले ही एक साल के लिए माननीय बने हो, लेकिन 30 साल या उससे अधिक देश की सेवा में बिताने वाले सरकारी कर्मचारी को पेंशन देने में गाल बजने लगते हैं। ऐसा क्यों? गरीबी हटाओ का नारा पीढ़ी दर पीढ़ी खिसकता आ रहा लेकिन फिर भी आप दांत चियारे घूम रहे हो, तरक्की के ढोल पीटोगे तो तुलना श्रीलंका पकिस्तान बांग्लादेश से करोगे, जिसमें बांग्लादेश तो हमीं ने बनाया,चाइना से तुलना करने में नानी मरती है।

हर बड़ी घटना दुर्घटना पर सबकुछ बदलकर रख देने का वायदा आखिर किस मुँह से करते हो जो फिर हमें दिखाने को सामने आ जाते हो? एक निर्भया कांड के बाद उसके नाम पर बने फंड को भी खर्च नही कर पाते हो, क्या हम आपको संवेदनशील मानें? हम इतने विकसित हो गये कि आप विधायक और सांसद निधि पूरी खर्च ही नही कर पाते?आपको सोचना पड़ता है कि किस मद में दूँ? या कोई और बात है जो हम कहना नही चाहते और आप सुनना नही चाहते? संसद में हमारी खातिर सवाल करने में आपको शर्म आती है,कभी इसके लिए भी पैसा ले डालते हो।हम सड़क पर चलने का एकबार में टैक्स अदा कर चुके होते हैं, फिर भी टोल टैक्स देना होता है, क्या ये सुविधा देने के नाम पर हमसे ली जाने वाली अघोषित घूस नही है? क्या स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर हमसे होने वाली लूट रोकना आपका काम नही है? क्या ये वादा आप हमसे दशकों से नही करते आ रहे हो या फिर नही किया है?

आप सभी अपने झूठे सच्चे वायदों इरादों के साथ एक मंच पर क्यों नही आते सच दिखलाने को? संसद और विधानसभाएं हंगामे की भेंट चढ़ने पर भत्ता लेते शर्म क्यों नही आती आपको? क्यों एक ही देश में दो देश भारत और इंडिया बना के रखा है? क्यों आजादी के सात दशकों बाद भी आप अपने बच्चों के पढ़ने लायक प्राइमरी स्कूल का निर्माण नही कर पाए? माननीयों आपके बच्चे सरकारी अस्पतालों में नहीं पैदा होते,क्यों? क्यों आपको इलाज कराने विदेश जाना पड़ता है?ये कौन सा देश और कैसा देश बना के रखा है आप माननीयों ने जहाँ आजादी के सात दशक बाद भी 40 प्रतिशत अंक वाला नौकरी में होता है और 80 प्रतिशत वाला सड़क पर। जहाँ अंगूठाछाप भी मंत्री बन सकता है।

जहाँ किसी रेप पीड़िता से भी बड़ा दुःख किसी जाति विशेष पर टिप्पणी करना है, क्योंकि एस.सी.एस.टी. केस में जेल लेकिन रेप मामले में जांच जरुरी है। ऐसा क्यों बनाया जहाँ उद्योगपतियों को तो ऋण पर ऋण मिलता जाता है और किसान चंद रूपये न चुका पाने पर आत्महत्या कर लेता है।यहाँ बेईमान और ऋण न चुकाने (बिजली या फिर फसल) की मंशा वाले का ऋण माफ़ हो जाता है और ईमानदारी से जमा करने वाले को ऋण मुक्ति के नाम पर पांच रूपये पचहत्तर पैसे का चेक मिलता है (जिसे बनाने और प्रदान करने की प्रक्रिया में ही चेक कि धनराशि से कई गुना ज्यादा खर्च हो जाता है)। यहाँ लाभान्वित होने वाले लोगों को मिले धन या लाभ से अधिक सरकारी आयोजन पर खर्च होता है।यहाँ अध्यापक भी घूस देकर अध्यापक होता है या फिर घूस खाता खिलाता है। गुरुओं और गुरुकुलों को संभालकर रखना क्या आपकी जिम्मेदारी नही थी? प्रतिभाओं के पलायन को रोकना क्या आपकी जिम्मेदारी नही थी या है? सिस्टम बदलने का वायदा आपने कभी क्यों नही किया? और गर किया तो बदल क्यों नही पाए? अगर कोशिश भी की तो रोड़े अटकाने वालों को सबक क्यों नही सिखाया? समय की मांग है संविधान और कानूनों में जरुरी बदलाव और मानसिकता का विकास करना वरना इक्कीसवीं सदी में तरक्की कम पतन ज्यादा होना तय है

दिनकर श्रीवास्तव
@dinksri

लेख में दिए विचार लेखक के है उनसे कालिदास क्लब  का सहमत होना आवश्यक नहीं है

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