बीजेपी के लिए आत्म-मंथन का समय, कांग्रेस के आये अच्छे दिन – रोहित श्रीवास्तव 

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कहते हैं एक सशक्त लोकतंत्र वहीँ है जहाँ लोगों की आवाज़ को बड़ी शिद्दत से सुना जाता है. जहाँ लोगों का मत सर्वोपरि होता है. लोगों की अंतर-आत्मा की आवाज़ को अंतिम माना जाता है. साथ ही एक सशक्त विपक्ष लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण और निर्णयकारी भूमिका निभाता है. अगर ऐसा नहीं होता है तो देश लोकतंत्र न होकर तानाशाही राज्य बनने की ओर अग्रसित हो जाता है.

यह बात हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हाल में हुए ५ राज्यों के नतीजों ने एक बार फिर से बता दिया है कि देश में लोकतंत्र ही सर्वोपरि है. लोकतंत्र के ऊपर न कोई था और न ही कोई होगा. दिलचस्प है कि पाँचों राज्यों में सत्ताधारी बीजेपी को एक बड़ी हार झेलनी पड़ी है. यह हार बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले राज्यों में मिली है. बात चाहे छत्तीसगढ़, राजस्थान की हो या फिर मध्य प्रदेश की, बीजेपी को यहाँ मुंह की खानी पड़ी है. बीजेपी की हार के पीछे कारण चाहे जो भी हो लेकिन इस हार ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि जनता की अदालत में न्याय सबको न्यायपूर्ण तरीके से ही मिलता है.

एक तरफ बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस को एक बड़ी और संजीवनीरुपी जीत मिली है. कांग्रेस की इस जीत और बीजेपी की इस हार के कई मायने हैं. कांग्रेस के लिए यह जीत २०१९ के लोकसभा चुनावों से पहले किसी संजीवनी से कम नहीं है वहीँ बीजेपी के लिए यह हार उनके लिए आत्म-अवलोकन का दरवाजा खोलती है.

कांग्रेस के लिए समय है कि कैसे इस जीत को २०१९ के लोकसभा चुनावों के लिए आधार बनाया जाए, साथ ही दूसरी तरफ बीजेपी के लिए आत्म-मंथन का समय है कि आखिर क्यों पार्टी को 3 राज्यों में हार झेलनी पड़ी है. बीजेपी की इस हार के बाद लोगों ने मोदी लहर पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए हैं. लोग पूछ रहे हैं कि क्या मोदी लहर का प्रभाव अब कम होने लगा है. क्या बीजेपी की यह हार मोदी लहर की भी हार है. प्रश्न तो वाजिब है लेकिन इसका जवाब मिलेगा या नहीं, यह निश्चित नहीं है.

बीजेपी को जिन राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है वहां के जाने वाले मुख्यमंत्रियों ने इस हार की जिम्मेवारी स्वयं ही ली है. यहाँ तक कि बीजेपी के प्रवक्ताओं ने भी इसी राग को अलापा है. उनका मानना है कि इस हार के पीछे सत्ता-विरोधी लहर है. सभी ने एक स्वर से केन्द्रीय नेतृत्व को बचाने की कोशिश की है. साथ में मोदी-ब्राण्ड को बचाने की कोशिश की है. वो मोदी ब्रांड जिसके दम पर बीजेपी अभी तक चुनाव जीतती आई है. अंत में देखना होगा कि २०१९ में ऊँट किस ओर करवट लेगा. क्या मोदी लहर अपना विजयी किला बचाने में कामयाब होगी या फिर राहुल गाँधी का करिश्मा चलेगा. राजनीति के कुछ जानकारों ने इसे राहुल गाँधी की नरेन्द्र मोदी पर जीत भी बताया था. यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल और मोदी की इस अप्रत्याशित लड़ाई में कौन विजयी होगा

रोहित श्रीवास्तव 

लेखक स्वतंत्र राजनैतिक विशेल्षक है 

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