भीमवाद एक ऐसा फोड़ा बन चुका है, जो फटेगा तो देश गृहयुद्ध की तरफ ही जायेगा : पवन प्रजापति

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भीमवादियों के कमेन्ट पढ़कर लगता है कि भीमवाद एक ऐसा फोड़ा बन चुका है, जो फटेगा तो देश गृहयुद्ध की तरफ ही जायेगा।

भीमवादियों को देश की बिल्कुल ही चिन्ता नही, और हो भी क्यो, बाबा को भी तो नही थी।

बहुत कम लोग जानते होगे कि बाबा को 1941 मे ब्रिटिश सरकार ने सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया था और अम्बेडकर के आह्वान पर महारों ने ब्रिटिश सेना के “महार रेजिमेन्ट” मे शामिल होना स्वीकार कर लिया था। बाद मे यही महार रेजिमेन्ट के सिपाही बर्मा मे सुभाषचन्द्र बोस की “आजाद हिन्द फौज” से लड़े थे।

इस तरह बाबा भारत के एक बेटे से दूसरे बेटे को मरवा रहे थे! अब सोचो कि बाबा कितने कुशल कारीगर थे?

वास्तव मे अम्बेडकर को लगता था कि अंग्रेज भारत से नही जायेगे, अतः वे अंग्रेजों के वफादार बने रहना चाहते थे, पर ये बात बामसेफी कभी नही बताते। ये बाबा का पूरा इतिहास नही बताते, केवल नीला-नीला बताते हैं, पर काला-काला छुपा लेते हैं।

एक और सामाजिक बात मै यह कहना चाहूँगा कि कम से कम हमारे यूपी के जाटव (चर्मकार) कभी अछूत नही थे, बल्कि उन्हे एक षणयन्त्र के तहत अम्बेडकरवाद को हवा देने के लिये खुद बामसेफियों ने ही अछूत बना दिया।

वास्तव मे अम्बेडकर केवल महारों के नेता भर थे और वे उत्तर भारतीय चर्मकारों से अनभिज्ञ ही थे। उनके बाद उनका आन्दोलन भी महाराष्ट्र के महार ही चला रहे थे। आज से लगभग 40 साल पहले उत्तर भारत मे अम्बेडकर का कोई प्रभाव नही था! फिर एक महाराष्ट्र के महार डी.के. खापर्डे ने काशीराम को भड़काकर उत्तर भारत मे अम्बेडकरवाद का बीज बोया।

काशीराम तो खुद सिख धर्म के थे, उन्हे हिन्दू वर्णव्यवस्था से क्या मतलब! पर उन्होने अम्बेडकर की ब्राण्डिंग करने के लिये वर्णव्यवस्था और अछूतपन का खूब रोना रोया। उत्तर भारत मे अम्बेडकरवाद काशीराम ही लेकर आये, जो अनपढ़-देहाती यूपी-बिहार के जाटवों मे खूब फूला-फला।

अब इस विचारधारा को प्रांगढ़ बनाने के लिये झूठी-मूठी कहानियां गढ़ी जाने लगी, जिसके तहत यूपी के जाटवों को अछूत और समाज से बहिष्कृत बताकर उन्हे भड़काया गया कि यदि अम्बेडकर न आये होते तो ब्राह्मण तुम्हे कब का खा गये होते।

एक पुरानी कहावत है कि यदि “एक इंसान के मुँह मे जहर डालो तो वह अकेले मरेगा, पर यदि जहर उसके कान मे डालो तो वह खुद तो मरेगा ही, अपने साथ कई अन्य को भी मारेगा।”

बस ऐसा ही हो रहा है, बामसेफी जाटव युवाओं के कान मे जहर भरने का काम कर रहे हैं।
जाटवों को यह समझाने की जरूरत है कि न तो वे कभी अछूत थे और न ही उनका इतना शोषण हुआ जितना बामसेफी बताते हैं! जाटवों के लिये तो अम्बेडकर से अधिक जगजीवन राम ने काम किये है।

इन्ही महारों ने भीमवाद खड़ा करने के लिये और थोड़े से सरकारी फायदे तथा आरक्षण की लालच मे जाटवों पर जन्मजात अछूत का ठप्पा लगा दिया तथा उन्हे मुख्यधारा से काट दिया है।

मेरे खुद के गाँव मे भी लगभग बीस घर जाटव है, 15-20 साल पहले लगभग दो घर ही चमड़े उतारने का काम करते थे, बाकी दूसरे लोग कच्चे मकान की मरम्मत (नरिया-खपड़ा) का काम करते थे। अब यदि ये अछूत थे तो लोग इन्हे अपने घर की मरम्मत करने कैसे बुलाते थे?

यही नही.. इन्ही मे से एक की पत्नि धाय का काम करती थी, जब गाँव मे किसी महिला को बच्चा पैदा होने वाला होता तो लोग उसी को बुलाकर लाते! वह घर के अन्दर तक जाती, और जब बच्चा पैदा होता तो सबसे पहले बच्चे के मुँह मे अंगुली भी वही डालती।

अब सोचो, कि यदि वह अछूत थी तो ब्राह्मण भी अपने बच्चे के मुँह मे उसे अंगुली कैसे डालने देते थे?
पहले के जमाने मे (लगभग आज भी) ढ़ोल-ताशे बजाने वाले अधिकांश जाटव ही होते थे! यदि वे लोग अछूत थे तो तमाम लोग उन्हे अपने घर किसी भी प्रसंग या शादी-विवाह जैसे शुभ कार्यों मे ढ़ोल बजाने के लिये कैसे बुलाते थे?

विवाह पश्चात दुल्हन की पालकी ढ़ोने वाले भी इसी जाति के लोग थे, फिर लोग अपनी नववधु की पालकी इन्हे कैसे छूने देते थे?

यह सब सोचनीय बात है…. वास्तव मे महारों की धूर्तता और बामसेफिया राजनीति इन भोले-भाले लोगों को अछूत बनाने पर तुली है। अब समय आ गया है कि समाज के बुद्धिजीवियों को चाहिये कि इनको सच बताऐं और इनके भीतर फिर आत्म-सम्मान जगाऐं कि आप अछूत नही हो, बल्कि आप बामसेफिया राजनीति के शिकार हो गये हो। यह सच है कि उनकी आर्थिक स्थिति उस समय दयनीय थी, पर अछूत तो हरगिज नही थे। या तो बामसेफियों को अछूत का शाब्दिक अर्थ ही नही पता।

वैसे भी बामसेफियों की बातें बाबा के संविधान की तरह एक राज्य से दूसरे राज्य मे बदलती रहती है! अब उदाहरण के लिये जैसे यूपी और बिहार मे पटेलों को ओबीसी कोटे मे आरक्षण है, तो बामसेफी पटेलों से कहते हैं कि ब्राह्मणों ने तुम्हे शूद्र बनाया था, और बाबा ने तुम्हे आरक्षण दिया। लेकिन गुजरात मे इन्ही पटेलों को आरक्षण नही है, तो यहाँ कहते हैं कि बाबा ने प्रावधान तो बनाया था, पर मनुवादी सरकारों ने नही दिया!
अरे बेशर्मो! अगर यूपी/बिहार मे मिला तो श्रेय बाबा को देते हो, और यहाँ नही मिला तो उनका जिम्मेदार कौन?

दूसरी बात यूपी/बिहार के पटेल ओबीसी मे है तो शूद्र हैं, फिर गुजरात के पटेल कौन से वर्ण मे हैं?

इस पोस्ट मे मै केवल जाटवों से यही कहूँगा कि आप महारों की भीमिष्ट परियोजना से बाहर निकलो, अन्यथा आप प्रलयकाल तक खुद को अछूत ही समझोगे, और आपका आत्मविश्वास खोया ही रहेगा।

आप खुद विचार करो.. कि केन्द्र या राज्य मे कोई भी सरकार आये, सबसे पहले दलितों के लिये योजनाऐं बनती है। उन योजनाओं मे जो धन लगता है, वह कहाँ से आता है?

उसका अधिकांश पैसा उन्ही लोगों के टैक्स से आता हैं, जिनको आप बामसेफियों के भड़कावे मे आकर गाली देते हो।

(From the Facebook Wall of Pawan Prajpati)

लेख में दिए विचार लेखक के है , kalidas क्लब का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है

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  1. […] मेरी पिछली पोस्ट के बाद कई लोगो ने मुझे मैसेज करके कहा कि आपका झगड़ा यदि भीमवादियों से है तो आप अम्बेडकर का अपमान क्यों कर रहे हो? […]

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