जिसकी जितनी भागेदारी उसकी उतनी हो हिस्सेदारी का नारा भारत के लिए श्राप है – आशु भटनागर

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जिसकी जितनी भागेदारी उसकी उतनी हो हिस्सेदारी.. अक्सर राजनैतिक गलियारों में ये नारे हम सुनते है लेकिन क्या वाकई यही किसी देश की सफलता का पैमाना है या फिर आज ये एक श्राप हो गया है जिसने भारतीय लोकतंत्र, जनमानस को सिर्फ जातीय संकीर्णता पर लाकर खड़ा कर दिया है
क्या वाकई हिस्सेदारी के परिणाम स्वरूप चूहे , मुर्गो को शेर की जगह जंगल का राज पाठ दिया जा सकता है I

असल में बीते ३० बरस में अगर राजनीती में सबसे ज्यदा गिरावट आई तो वो इस बात को लेकर आई की आखिर सरकारे कैसी चुने जाए I संसार के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के आरम्भ में वोटर शैक्षिक तोर पर अनपढ़ ज़रुर था लेकिन सामाजिक जागरूकता उसमे थी I

लेकिन जैसे जैसे राजनीती में अपराधी तत्वों और स्वार्थी तत्वों का बोलबला होता गया हमने देखा की लोग जाती , गुंडागर्दी के तरीको से लोकतंत्र में स्थान लेने लगे I

और आज जिसकी जितनी भागेदारी उसकी उतनी हो हिस्सेदारी तक आ कर रुक गये है I भागी दारी ने आपकी योग्यता , नैतिक मूल्यों के आदर्शो को कहीं दूर फेंक दिया है जिसके कारण आज देश में सिर्फ जातीय नफरत और एक दुसरे के प्रति नफरत है

मजेदार बात ये है की भागीदारी के फार्मूले पर काबिज ये लोग ये नहीं बताते की की आखिर इनके दिमाग में क्या है ?
क्या सिर्फ सत्ता पा जाना ही आज का मूल मन्त्र है या देश के लिए कोई प्लान बनान भी इनके ध्यान में है I
आज संसाधनों की उपलब्धता पर कोई बात नहीं करता है लेकिन संसाधनो की लुट को भागी दारी और हिस्सेदारी के फार्मूले पर हासिल करना ही एक मात्र मूल मन्त्र बन गया है ऐसे देश में एक बार फिर इस भागी दारी और हिस्सेदारी के नाम पर हो रही लुट को रोकने का वक्त आ गया है
आज समाज में मूल मांगे होनी चाहिए सबको सामान शिक्षा , सबको सामान स्वास्थ्य लेकिन सत्ता का लांच और जातीय संकीर्णता क्या वाकई इस सब को होने देगी
आशु भटनागर

लेखक सीरियल एंटरप्रेनौर है, पिछले १८ सालो से आईटी , डिजिटल मीडिया मार्केटिंग और वेबमीडिया से जुड़े है कालिदास क्लब समेत कई अन्य मीडिया पोर्टल का संचालन भी करते है 

1 COMMENT

  1. जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी.. मतलब संख्या भारी करना देश और सवर्ण समाज पर किया गया एहसान है?

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