लिबरलिज़्म की जड़ में जाओ तो इसके मूल में आपको कहीं ना कहीं कोई फेमिनिस्ट ही मिलेगी…. राजेश भट्ट

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फेमिनिज्म नाम का वाइरस पहले अस्तित्व में आया…जब कुछ तथाकथित पढी लिखी महिलाओं को लगने लगा कि “”अरे ये तो हमारे साथ अन्याय होता आ रहा था आजतक….हमें पता ही नहीं चला””…अपने एजेंडे को मजबूत करने के लिए उन्हें संख्याबल की आवश्यकता महसूस हुई..उन्होंने सामान्य महिलाओं पर अपना जाल फेंकना शुरू किया….कुछ बेचारी इनके झांसे में आ गई लेकिन अधिकतर ने इन्हें ठेंगा दिखा दिया..उनके पास निभाने के लिए जिम्मेदारियां जो थी..फालतू समय नहीं था डूडनियों की तरह..

कई सालों तक ये अपना एजेंडा सेट करती रही पर दाल नहीं गली….कालांतर में सोशल मीडिया के आगमन ने इन डूडनियों की चांदी कर दी..इन्होने फेमिनिज्म के ऊपर लिबरलिज़्म का वर्क चढ़ा एक नया हाइब्रिड प्रोडक्ट मार्केट में उतार दिया..मूल प्रोडक्ट फेमिनिज्म ही था लेकिन फेमिनिज्म के नाम पर पुरुषों को कैसे जोड़ा जाता ??…हर इंसान से प्रेम का मन्त्र सोशल मीडिया में फूंक दिया….हुस्न के जलवे फेंक फेंक ये लिबरलिज़्म का वाइरस पुरुषों में भी फ़ैलाने लगी…आप गौर कीजियेगा..फेमिनिज्म और लिबरलिज़्म एक दूसरे के पूरक हैं..ऐसी कोई डूडनी नहीं मिलेगी जो लिबरल हो पर फेमिनिस्ट ना हो या फेमिनिस्ट हो पर लिबरल ना हो..इन दोनों वाइरसों का चोली दामन का साथ है….या तो दोनों ही दुर्गुण उसमें पाए जायेंगे वरना वो एक “सामान्य” स्त्री ही होगी…अब हुआ यूं कि यहाँ सोशल मीडिया में कई कुंठित पुरुष क्षणिक आभासी सुख के लालच में इनके चंगुल में फंसते गए….इनमें तीन वैरायटी के लोग होते हैं…एक तो कुंठित लौंडे…दूसरे बीवी से दुखी पति या दैहिक सुख के प्रति अति आसक्त लोग….तीसरे वो बुड्ढे जिनकी बुढ़िया अब खाट पकड़ चुकी है (हालांकि बस का उनके भी कुछ नहीं पर दिल है कि मानता नहीं)…आभासी सुख पाने के लिए वो इन डूडनियों की बातों को बिना समझे उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगे…फोटो पर लार चुआने लगे…इनकी ख़ुशी के लिए किसी से भी भिड़ने को तैयार रहने लगे..

धीरे धीरे संख्याबल इस तरह से बढ़ा कि इन लंडूरे पुरुषों का एक अलग ही धर्म बन गया जिसमें हर धर्म और जाति के पुरुष शामिल हो गए…ठरकीयों का वैसे भी कोई धर्म नहीं होता..

अब हुआ यूं कि ठल्ले बैठे बैठे “”सर्वधर्म सम्भाव”” नामक जुमला ईजाद हो गया…और वो जुमला हिट भी हो गया…लेकिन मात्र हिन्दुओं में..बाकी चालू थे क्योंकि अपने अलग एजेंडे जो थे…..हिन्दू ईद पर आपस में गले मिलने लगे…क्रिसमस ट्री सजाने लगे…हैलोवीन पार्टियां करने लगे..पुराणों को कुरेद-कुरेद किस किस भगवान् ने क्या क्या काण्ड किये हैं इसका शोध करने लगे….राक्षसों में भी दिव्य गुण ढूँढने लगे…देवताओं द्वारा मारे गए राक्षसों का वध इन्हें ह्त्या लगने लगा…इससे समाज आधुनिकता की ओर आगे बढ़ते हुए भी पारस्परिक भाईचारे और समन्वय के मामले में पिछड़ा होता चला गया…एक मानसिक विकृति ईजाद हो गई जिसका रूप समय के साथ और भी भयानक होता जा रहा है..अपनी विचारधारा को सही साबित करने के लिए ये देश,धर्म,समाज को कितनी भी क्षति पहुंचा सकते हैं…आगे और भी बुरा देखने को मिल सकता है..
आप मानो ना मानों फेमिनिज्म ही आधी समस्याओं की जड़ है वर्तमान में…

राजेश भट्ट की फेसबुक वाल से 

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