ग़र हम न्यायपालिका के भरोसे रहें, तो कमसेकम पूर्व के इतिहास को देखते हुए अगले दो-तीन दशकों तक तो श्रीराम मन्दिर बनने से रहा -कुमार प्रियांक 

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ग़र हम न्यायपालिका के भरोसे रहें, तो कमसेकम पूर्व के इतिहास को देखते हुए अगले दो-तीन दशकों तक तो श्रीराम मन्दिर बनने से रहा। आधी रात को सुनवाई यहां केवल ख़ास मामलों में ही होती है, वरना तारीख़ पर तारीख़ तो इस देश की न्यायपालिका की एक तल्ख़ सच्चाई है।

देश की बहुसंख्यक जनता अब मोदी जी को ही देख रही, जो राजधर्म का पालन कर रहे प्रधानमंत्री के पद पर बैठ कर। अब अगली तारीख़ 10 जनवरी है इस साल की। उस दिन नयी बेंच का गठन होगा। फिर तय होगा कि क्या रोज़ सुनवाई होगी या नहीं।

ऐसे करते-करते तो सदी बीत गयी। पर फ़ैसला न आया। ग़र इस मुद्दे पर हिन्दुओं का दावा कमज़ोर होता या दोनों तरफ़ हिन्दू ही होते पक्षकार, तो फ़ैसला कब का आ गया होता। पर अब बिल्ली के गले में घण्टी बांधे कौन ? तब जब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया कह चुकी है कि जो साक्ष्य मिले हैं, वह स्पष्ट इशारा करते हैं कि बाबरी ढांचे के नीचे मन्दिर था। ख़ुद एएसआई के पूर्व निदेशक के० के० मोहम्मद साहेब यह कह चुके हैं।

फिर विलम्ब क्यों ? क्योंकि एक पक्ष अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ है। उसे बहुसंख्यक आस्था से कोई मतलब नहीं, पूर्वाग्रह से परिपूर्ण वामपंथी इतिहास भी जिसका गवाह है।

अब समय आ गया है कि एक दबाव समूह के रूप में एकजुट होकर कार्य हो, ताकि वर्तमान केंद्र सरकार इस दिशा में त्वरित सक्रिय हो सके। भाजपा अच्छे से जानती है कि बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद चार राज्यों में उसकी सरकारों का क्या हुआ था। इसलिए उसे दोष न दें, अपनी भी सक्रियता बढ़ाएं ताकि नेतृत्व को भरोसा हो सके कि देश की बहुसंख्यक अवाम उसके साथ है इस मुद्दे पर।

वरना फिर तो सदियां गवाह हैं कि राम भरोसे ही सब कुछ होता आया है यहां। अभी नहीं, तो कभी नहीं।
जय श्रीराम..🚩🙏🚩
– कुमार प्रियांक 🇮🇳

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