भगवान् राम आदर्श परिवार के प्रतीक है उन्हें समाज में पुनर्स्थापित करना ही हम सबका उद्देश्य होना चाहए – आशु भटनागर

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क्या आप जानते है १९९० तक इस देश के माध्यम वर्ग में भगवान् राम आदर्श पुरुष थे, राम परिवार हर घर में विराज मान होता था, संयुक्त परिवार इस देश की शान थे लोग किसी भी धर्म के हो राम सबके पूजनीय थे I देश में माध्यम वर्ग सिमित आय में सपने अपने लिए कम परिवार के लिए ज्यादा देखता था I यहाँ तक की उस दौर में भी पारिवारिक फिल्मो में कहानी यही होती थी की संयुक्त परिवार में कुछ खराबी भी आये मतभेद भी आये तो अंत में सब मिल जाते है I १९९७ में आई हम साथ साथ है ऐसी आखरी फिल्म थी I
 

१९९२ में जब राम मंदिर के लिए विदेशी धर्मो ने उग्र हिंदुत्व का रूप देखा तो ७० सालो से अपनी धर्मांतरण के कार्य में लगे इसाई और इस्लाम के लोगो के हाथ पैर फुले I मुमबई बम विस्फोट के बाद मुसलमान जहा हाशिये पर आये वहीं पीछे शान्ति के प्रतीक बने इसाई धर्म ने अपनी पुरानी रणनीति पर पुनर्विचार किया I

एक फिल्म अमर अकबर एंथोनी के माध्यम से ७० के दशक हुए साईं के एक्सपेरिमेंट को अब नए सिरे से प्रदर्शित करने की योजना बननी शुरू हुई I

 

९० के दशक ख़तम होते होते उत्तर भारत में साईं के कुछ एकल बड़े मंदिर स्थापित किये गए I लेकिन इन मंदिरों में भक्तो को लाना अब भी टेडी खीर थी तो उसके लिए फिर से एक फिल्म का ही सहारा लिया गया, फिल्म थी बीबी नम्बर १ …वासु भागनानी की इस फिल्म में साईं को अब बड़ी ही चालाकी के साथ ओम और राम के बीच में सेट किया गया I

अयोध्या में ढाचे के गिराने के लिए खुद को दोषी मान चुके हिन्दू जनता को ईश्वर अल्लाह तेरो नाम की तरह ये लगा की शायद ये भी ऐसे ही एक कोई सेकुलर लाइन है जिसमे हमें सब धर्मो को मानना है, लेकिन बड़ी ही चालाकी से इस फिल्म के जरिये पहली बार साईं ने घर के मंदिर में जगह बना ली
 

जो राम अब तक छोटे भाई लक्ष्मण , माता सीता और पवन पुत्र हनुमान के साथ नजर आ रहे होते थे उनके नाम को इस तरह से बदला गया कि अगले २० साल तक एक नयी पीड़ी राम के साथ साईं को ही असली भगवान् मानने लग गयी I

 
फिल्म भी एकल परिवार की ही थी और इसी बीच ९० में उदारीकरण के बाद भारत में एक नयी क्रांति आई अब तक सिर्फ अरब जाने वाले देश के युवा कनाडा और अमेरिका जाने लगे I मेट्रो शहरों में नए उधोगो में रोजगार के लिए जाने से संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार हो गये I फिल्मो से समाज और धर्म को कैसे बदला जा सकता है ये बीते २० सालो में देश ने जाना I एक पूरी नयी पीड़ी के लये साईं ही असली भगवान् हो गये
 
बेचारे शंकराचार्य ने एक बार इसमें कुछ कहने की हिम्मत भी की तो विदेशी मिशनरी के पैसो पर चलने वाले NGO ने उनको ही धमका दिया I
२ दशक की सफलता के बाद आखिर कार २०१७ में जब दुबारा से भगवान् राम के नाम की गूंज उठी तो अपने सेकुलर ब्रांड साईं की सफलता में डूबे लोगो ने ध्यान नहीं दिया
 

लेकिन जब २०१८ में वापस लोगो ने भगवन राम मंदिर के लिए जुटना शुरू किया और सरकारों ने भी भगवान् राम को लेकर अयोध्या में खुद को एक्टिव किया तो एक बार फिर से धर्म की राजनीती की शतरंज बिछ गयी है I बीते २० सालो में हिन्दू धर्म में अंदर तक घुस चुके लोगो को लग रहा है की ये तो वापस जड़ो की और लौट रहे है कहीं फिर राम परिवार तो एक नहीं हो जाएगा कहीं फिर से एकल परिवार संयुक्त परिवार तो नहीं बन जायेंगे I

अगर ऐसा हुआ तो भारत को वापस गुलाम और यहाँ पर विदेशी धर्मो के राज की उनकी रणनीति का क्या होगा I क्या इसके लिए इतना किया गया था
और फिर से एक बार कोशिश शुरू हुई भगवान् राम के मंदिर को रोकने की , फिर से आवाजे आयी की वहां अस्पताल और स्कुल बनाओ लेकिन वहां पर स्कुल और अस्पताल मांगने वाले अपने धर्मो के मक्का और वेटिकन में स्कुल नहीं मांगते अस्पताल नहीं मांगते
 
ये सब आज इसलिए लिखना ज़रूरी है की आज देश भगवान् राम के नाम पर फिर से एक हो रहा है , भगवान् राम सिर्फ भगवान् नहीं इस देश की संस्कृति है , संयुक्त परिवार के प्रमुख आदर्श है उनको वापस स्थापित करके ही समाज में शान्ति लाई जा सकती है सबको एक किया जा सकता है I और अब उसका समय आ गया है
© आशु भटनागर आशु उवाच

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