इस युग का रामायण भी ऋष्यमूक पर्वत तक पहुच गया है – पंकज कुमार झा

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प्रभु श्रीराम में ऐसा क्या है कि रसिकगण कल्पों और मनवन्तरों से उनके नाम का गुणानुवाद करते आए हैं लेकिन, इस अखिलकोटि ब्रम्हांडनायक परात्पर ब्रह्म का नाम लेते रहने से रसना थकती नही, विश्रांति नही लेना चाहती जिह्वा कभी. तुलसी बाबा ने कहा ही मानस में- राम चरित जे सुनहि अघाही, रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं…
… लेकिन सामान्यतया लोगों को हर चीज़ भौतिकता और तर्क की कसौटी पर ही कस कर चाहिए. ऐसे लोगों के लिए भी यही कहना होगा कि प्रभु का नाम लेते रहने मात्र से 2 से 282 हो जाना किसी चमत्कार से कम है क्या? क्या ऐसा किया जाना किसी व्यक्ति के बूते की बात थी? नही महराज… राम काज के लिये ही यह सब हुआ है, इसे बिसरिये नही.
जानते हैं… रामचरित का एक और बड़ा चमत्कार क्या है? चमत्कार यह भी है कि अगर आप राम अनुरागी हों तो हर प्रसंग की आप युगानुकूल व्याख्या कर सकते हैं, साथ ही नव युग की हर घटना का साम्य रामकथा में तलाश कर आप प्रश्नों का समाधान पा सकते हैं.
जैसे ‘282’ होने का साम्य हमें खोजना हो तो वालि-सुग्रीव प्रसंग में तलाशिए. कौन ऐसा मान सकता है कि वालि निर्दलनम का काम सुग्रीव के वश की बात थी? वालि वध और ‘सुग्रीव’ के राज्यारोहण का कार्य तो श्रीराम की कृपा से ही संभव हो सका था न? लेकिन सुग्रीव भी यह भूल गया था कि उसे राजा बनाने में केवल ‘राम-काज’ निहित था, जिसे किए बिना किसी तरह का विश्राम या प्रमाद उचित नहीं. सुग्रीव को यह भी याद रखना था कि राज्य विस्तार या विकास आदि कोई ऐसा विषय नहीं है जिसके लिए उसे राजा बनाया गया है. यह काम तो सोने की लंका बना कर रावण ने भी बेहतर कर लिया था. है कि नहीं?
आगे की कथा भी आप जानते ही हैं. क्रुद्ध लक्षमण को श्रीराम ने पम्पा पुरी भेज कर, सुग्रीव को सबक सिखाते हुए उसे अपना मूल कार्य याद दिलाने, फिर सुग्रीव के चेतने, समुद्र तरणं, लंका पुरी दाहनम, पश्चात रावण-कुम्भकर्ण हननं आदि में योगदान देते हुए भारतवर्ष को श्रीराम का मंदिर बन जाने में निमित्त बन जाने तक की यात्रा तय की फिर सुग्रीव ने.
इस युग का रामायण भी ऋष्यमूक पर्वत तक पहुच गया है. यहां भी रामलला अपने टेंट रूपी पर्वत में विराजते हुए स्वतंत्रता सीता की खोज प्रारंभ होने की राह तलाश रहे हैं. ‘वर्षा विगत शरद ऋतु आयी…’ अद्भुत संयोग की सच में अभी ऋतू भी वहीं संकेत कर रहा है, अवसर भी यही आया है….
बस वर्तमान सुग्रीव को सारे भौतिक कार्यों पर श्रीरामलला के काज को वरीयता देने की याद दिलाने की ज़रूरत है. छः दिसंबर का यह परम पावन प्रसंग, लक्ष्मण जी की तरह रामदूत बन जाए, यही अभिलाषा आज आर्यावर्त की है. अब न चहिय अति देर प्रभु, अब न चहिय अति देर.
जय श्रीराम …. जय-जय श्री राम
पंकज कुमार झा

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