आज ७० साल बाद भी हम यही बहस कर रहे है – आरक्षण हो या ना हो : आशु भटनागर

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आशु भटनागर I  असल में १९३० से आंबेडकर ने जिस नफरत को हवा दी अब उसकी पूर्णता हो रही है I आप किसी भी दलित चिन्तक से मिले वो आपको यही बताएगा की चूँकि १००० साल उनके पूर्वजो का शोषण हुआ इसलिए अब आरक्षण जायज है, SCST में जेल भेजना भी इसी मानसिकता का परिचायक है I 
ये खेल बिलकुल बदले की भावना वाला है और इसके लिए पूर्ण रूप से आंबेडकर ज़िम्मेदार है , कभी संत रैदास ने , कबीर ने तुलसी ने इसकी पैरवी नहीं की और उस दौर में भी जब ऐसा कुछ आंबेडकर के दावो के अनुसार होता भी रहा तो भी समाज में इतनी नफरत नहीं फैली ..
फिर आज अब बीते ८० सालो में ऐसा क्या हुआ ?
असल में बीते ८० सालो में आंबेडकर जैसे सत्ता के लोभी नेताओं समाज के बलबूते सत्ता की प्राप्ति का जो सपना देखा वो आज भारतीय समाज को इस स्थिति में ले आया है I
लगभग उसी के आस पास अमेरिका भी अपने अस्तित्व का संघेर्ष कर रहा था उसने अपने यहाँ किसी प्रकार का आरक्षण या कोई एक्ट नहीं बनाया .. उन्होंने सबसे पहले सबको सामान शिक्षा , सामान स्वास्थ्य और सामान अवसर प्रदान करने के उद्देश्य को पूरा किया I वहां भी शुरूआती ४० साल खूब काले गोरो के संघेर्ष हुए लेकिन वो शिक्षा , स्वास्थ्य  या अवसर को प्राप्त करने के लिए नहीं हुए

लेकिन भारत चूँकि आंबेडकर , जिन्ना जैसे महत्वाकांक्षी नेताओं के जाल में फंस चुका था इसलिए यहाँ ऐसा नहीं हुआ , जिन्ना मुसलमानों का पाकिस्तान  लेकर अपना खेल खेल लिए  तो आंबेडकर दलितस्तान की जगह आरक्षण लेकर अपना, हालांकि जिन्ना और आंबेडकर दोनों ही व्यक्तिगत तोर पर इन सब के बाबजूद हारे हुए ही साबित हुए I

आज ७० साल बाद हम बहस कर रहे है की

देश में नौकरी में आरक्षण हो या प्रमोशन में ?
देश में SC/ST एक्ट लगे या नहीं ?

पर हम बात नहीं कर पा रहे है की क्या 7० सालो के बाद भी आप आज तक

१) सबको अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा देने के संसाधन बना पाए या नहीं ?
२) सबको अनिवार्य स्वास्थ्य सुविधा देने के संसाधन बना पाए या नहीं ?
३) सबको सामान अवसर देने के काबिल बना पाए या नहीं ?
वस्तुत ७० सालो से सिर्फ नीचा दिखाने और आरक्षण  की यथास्थिति को बनाए रखने की कोशिश करने में लगे नेता , चिन्तक और समाज ने अब इसको कोढ़ बना दिया है जिसे खुजाने में तो सबको मजा आता है लेकिन इलाज कोई नहीं करवाना चाहता सिर्फ एक दुसरे के बहते मवादो को देख कर खुश होना और दुसरे को अपनी बेबसी बताना कर खुद में लिए मलहम छीन लेने की आदत बना ली है
आरक्षण हो या ना हो पर जब तक इस देश में बहस मूलभुत सुविधाओं के पालन की नहीं होगी तब तक ऐसे ही समाज कोढ़ी बना रहेगा

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