यह सेल्फी के अदबों का शहर है, साहित्य के नाम पर सब कुछ है, साहित्य कहां है? सोनाली मिश्र

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हमारे सामने स्थितियां आती हैं, नैरेटिव हमें अपने आप बनाने होते हैं। हम अपने विचारों के अनुसार नैरेटिव गढ़ लेते हैं और फिर उन्हें स्थापित करने में एडी चोटी का जोर लगा देते हैं। जैसे पूंजीवाद व फासीवाद के नाम पर आज तक चैनल को कोसने वाले साहित्यकार आजतक जैसे चैनल के मंच पर न केवल आ रहे हैं बल्कि खींसे निपोर कर अपने आने को सही भी ठहराएंगे। मगर वह यह नहीं देख रहे कि साहित्य आजतक में जो सबसे बड़ा मंच है वह साहित्य का नहीं है। जहां सबसे ज्यादा शोर हो रहा है वह साहित्य का नहीं है, जहां सबसे ज्यादा लोग आ रहे हैं वह साहित्य का कोना नहीं है।

कल पहले सूफी संगीत फिर पीयुष कवि महाराज तथा उसके बाद मालिनी अवस्थी जी ने इस साहित्योत्सव को रंग दिया। जैसे ही आप इस प्रीमियम रजनीगंधा की प्रीमियम खुश्बू लेकर इस साहित्योत्सव में प्रवेश करते हैं माटी घर मे एक तरफ मंच सजा है, यहीं पर बहसें होंगी साहित्य की। शाम को नीलिमा चैहान वाले सत्र में अच्छे खासे लोग हो गए थे। मगर उससे पहले के दो सत्रों में उतने लोग नहीं थे जितने होने चाहिए। तथा उसके बाद जैसे ही आप आगे बढ़ेंगे वैसे ही जनसरोकार के लिए लिखने वाले लेखको के लिए एक वीआईपी लाउंज बनी है, जहां पर जनता के लेखकों को जनता से दूर कर विशिष्ट किया जाता है तथा वह इस काॅरपोरेट, पूंजीवादी वीआईपी लाउंज में आराम करेंगे आखिर वह आम लोग थोड़े ही न हैं, विशिष्ट हैं।

जहां ये सभी लेखक नेताओं की वीआईपी संस्कृति को हर समय कोसते नजर आते हैं वहीं ऐसे काॅरपोरेट के कार्यक्रमों के वीआईपी लाउंज मे बैंठ कर 56 इंच सीना कर लेते हैं। मुझे इस बात से कोई गुरेज नहीं बल्कि इन लोगो के दोगलेपन से गुरेज है। हां, तो जैसे ही आप आम लेखकों के इस वीआईपी लाउंज से आगे बढ़ेंगे तो बीच मे एक मैदान बनाया है कविता के लिए मंच! यहां पर नीचे कम और मंच पर अधिक लोग दिखाई देंगे तथा आसपास पुस्तक के स्टाॅल भी हैं जो जाहिर हैं खाली हैं। 

यह सेल्फी के अदबों का शहर है, साहित्य के नाम पर सब कुछ है, साहित्य कहां है, साहित्य के सरोकार कहां हैं, लोक कहां है, और आप खुद कहां हैं जरा देखिएगा, सोचिएगा। 

और इसके बाद जब आप पूंजीवाद या फासीवाद को कोसेंगे तो आपकी आवाज में कितनी धार होगी, या आपकी आवाज कितनी खोखली होगी यह आप समझ पाएंगे,

शायद नहीं। तब तक प्रीमियम रजनीगंधा वाले साहित्‍य की प्रीमियम गंध में खोकर साहित्‍य का आनंद उठाएं। जिसमें मुख्‍य प्रायोजक की भाषा भी हिंदी में नहीं है, ऐसे में हिंदी कहां होगी, जरा खाेजिएगा।

सोनाली मिश्र 

लेख में दिए विचार लेखक के अपने है उनसे कालिदास क्लब का सहमत होना आवश्यक नहीं

 

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