मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर आस्था के साथ प्रवेश करने के लिए होते हैं, आप वहाँ जाकर पिकनिक नहीं मना सकते, साबरीमाला विवाद पर सोनाली मिश्र

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मंदिर उपासना स्थल होते हैं, एक्टिविज्म का स्थान नहीं! हालांकि यदि आज मैं पोस्ट लिख रही हूँ, तो मैं जानती हूँ कि मुझ पर स्त्री विरोधी आदि का तमगा लग जाएगा! मगर यह बात भी सच है कि हर मुद्दे को व्यर्थ में स्त्री विमर्श से क्यों जोड़ना! स्त्री की समस्याएं, स्त्री विमर्श इन सबसे परे है.
जब मैं डीएस ग्रुप में नौकरी किया करती थी, तो उन दिनों मेरे ही एक बॉस के अधीन एक सज्जन थे, अयप्पा के भक्त! तब मुझे दक्षिण भारत के विषय में बहुत जानकारी नहीं थी. अभी भी नहीं है, मगर अब थोडा बहुत पढ़ कर हासिल कर लेती हूँ. एक बार उन्होंने मुझे सबरीमाला के विषय में बताया. और उन्होंने यह भी बताया कि उस मंदिर में एक नियत उपासना पद्धति और व्रत के बाद ही प्रवेश कर सकते हैं, और चूंकि मासिक धर्म वाली महिलाएं यह पद्धति नहीं कर सकती हैं क्योंकि यह पूरे चालीस या इकतालीस दिन की होती है, तो उनका प्रवेश नहीं होता. वह अयप्पा को बहुत मानते थे और उनकी माँ भी अयप्पा भक्त थीं, उन्होंने बताया कि वह अपनी माँ के साथ सबरीमाला मंदिर जाते थे.

बात आई गयी हो गयी. और जिस प्रकार पिछले दिनों इस उपासना पद्धति को स्त्री अधिकारों के साथ जोड़ दिया गया, वह अपने आप में हास्यास्पद है. मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर आस्था के साथ प्रवेश करने के लिए होते हैं, आप वहाँ जाकर पिकनिक नहीं मना सकते. या एक एक्टिविस्ट भगवान अयप्पा की मूर्ति के सामने सेक्स भी करना चाहती थीं!

हर लोक की अपनी एक परम्परा होती है, हर समुदाय की अपनी एक पद्धति होती है, यदि वह हिंसा कर रही है, आपके मूलभूत अधिकारों का हनन कर रही है तो यकीनन ही आप उसके लिए विरोध प्रदर्शन कर सकती हैं. न्यायालय का द्वार खटखटा सकती हैं.

मगर सबरीमाला मंदिर में जिस तरह का विवाद हुआ, वह कम से कम स्त्री अधिकार की बात नहीं है. या मैं इसे बिलकुल भी स्त्री अधिकारों का मुद्दा नहीं मानती.जिस स्थान पर आपकी आस्था ही नहीं, वहां जाने की क्या आवश्यकता? और वहां जाने को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाना? यदि आस्था नहीं तो खारिज करें और यदि आस्था है तो उसके नियमों का पालन करें! 

एक तरफ लोक की संवेदनाओं की दुहाई देते हुए कुछ लोग महिषासुर वध और रावण को दहन करने से मना करते हैं, उसके लिए अदालत में जाते हैं कि इन परम्पराओं पर रोक लगाई जाए, क्योंकि एक समुदाय की भावनाएं आहत हो रही हैं, और दूसरी तरफ वही लोग सबरीमाला के मंदिर में उपासना पद्धति के एकदम विरुद्ध जाकर स्त्रियों के प्रवेश करने का मामला लेकर जाते हैं. क्या अयप्पा के भक्तों की कोई भावना नहीं हैं? यदि हैं, तो उनकी भावनाओं के खिलाफ जाकर इस तरह का खिलवाड़? यह उस वर्ग विशेष के दोहरेपन को दिखाता है, और कुछ नहीं! 

और जब आप रिहाना और मेरी जैसे नाम की स्त्रियों को सबरीमाला मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश के लिए आतुर देखते हैं, तो मान लीजिए कि यह मामला स्त्री अधिकार का नहीं है. स्त्रियों के लिए बहुत सारे मामले हैं, आपके सामने!

इन डिज़ाईनर मुद्दों से स्त्री का हर संघर्ष कमज़ोर होगा यह मानकर चलिए जैसा कल न्यायालय ने मीटू के एक मामले में फटकार लगाई है.
जहां नारीत्व का अपमान हो, उसे एकदम खारिज करें, एकदम खारिज

सोनाली मिश्र की फेसबुक वाल से 

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