कटघरे में पत्रकारिता -कश्मीर के हालात बिगाडने का विदेशी-वामपंथी षडयंत्र : राजीव रंजन प्रसाद

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भारत को कौन लोग अस्थिर करना चाहते हैं? निश्चय ही पाकिस्तान, अमित्र देश और अप्रासंगिक हो गये ऐसे वामपंथी जिन्हें शहरी माओवाद के प्रसार में अपना भविष्य दिखाई पड़ता है। यह ऐतिहासिक समय है यहाँ पक्षधरताओं का नीरक्षीर किया जा सकता है।

प्रयोग के लिये इस समय अपने स्मार्ट टीवी पर अथवा यू-ट्यूब चैनलों पर कोई भी एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल, विदेशी समाचार चैनलों में “बीबीसी” तथा वामपंथी माध्यम में “दि वायर” पर नजर बनाये रखें। गजब समानता है तीनों में एक ही वेवलेंथ पर काम कर रहे हैं। धारा 370 और 35 ए को हटाने के पश्चात जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख ले कर इन तीनो ही माध्यमों का नैरेटिव समझिये, आगे के लिये भी ये प्रासंगिक उद्दरण बनेंगे।

इस विषय पर आगे बढने से पहले कुछ बातें जो ठीक ठीक प्रामाणित हुईं। पहली यह कि लद्दाख ने भारतीय संविधान के स्वयं पर प्रतीपादित होने का हर्षोल्लास से स्वागत किया है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि पहले जो जम्मू और कश्मीर कहा जाने वाला राज्य था, उसके आधे से अधिक भूभाग में कभी कोई समस्या थी ही नहीं, अपितु वहाँ के नागरिक अवांछित धारा 370 के उपनिवेष के तौर पर रहने के लिये बाध्य थे। कारगिल से सांसद जामयांग शेरिंग नामग्याल का जिस भव्यता से लद्दाख घाटी में स्वागत हुआ है वह इस दौरान की सबसे सुंदर और सु:खद तस्वीर है। जम्मू परिक्षेत्र से भी जो दृश्य, सूचनायें अथवा वक्तव्य सामने आये हैं वे बताते हैं कि भारतीय संविधान का हिस्सा बन कर वहाँ कमोबेश प्रसन्नता और सुकून का वातावरण है। इस तरह पाकिस्तानी अधिकृत कश्मीर तथा चीन अधिकृत लद्दाख क्षेत्र को छोड कर शेष भारतीय भूभाग के पच्यासी प्रतिशत से अधिक भूभाग पर शांति, सौहार्द और प्रसन्नता का वातावरण है। रही पंद्रह प्रतिशत अथवा उससे भी कम भूभाग में सिमटी कश्मीर घाटी…..इसमें भी सभी न तो अलगाववाद के समर्थक हैं न ही पाकिस्तान परस्त। घाटी से विस्थापित किये गये लगभग सभी धारा 370 हटाये जाने के समर्थक हैं तथा इसे स्वयं के साथ किये गये ऐतिहासिक अन्याय का अंत किये जाने की तरह देखते हैं।

एजेंडा मीडिया को लद्दाख और जम्मू की भावनाओं से कुछ भी लेना-देना क्यों नहीं? एक फर्जी विडियो “दि वायर” ने जारी किया था लेकिन कुछ ही देर बाद हटा लिया। इस विडियो के जारी करते ही वह पाकिस्तान जिसे अब तक अपना एजेंडा चलाने के लिये पुराने फुटेज ही मिल रहे थे उसकी बाँछें खिल गयी। इस करेले पर नीम की तरह बीबीसी चढ आया। बीबीसी की फुटेज बताती हैं कि कर्फ्यू में ढील देते ही स्थितियाँ बिगडी, गोली चली। घाटी से भी इस विडियो को भ्रामक बताया गया है।

पुलिस महानिदेशक की ओर से वक्तव्य आया कि पिछले छ: दिनों से घाटी में एक भी गोली नहीं चलायी गयी है। बीबीसी की रिपोर्टिंग इस समय पाकिस्तानी मीडिया के भारत के विरुद्ध प्रोपागेंडा का प्रमुख हथियार बन गयी है। बीबीसी और दि वायर के विडियो को ध्यान से देखने पर आप पायेंगे कि उन्हें सनसनीखेज बनाने के लिये खास तरह के संगीत और विजुअल्स का प्रयोग किया गया है। विडियो बनाने वाले स्पष्ट थे कि उन्हें क्या और किस नैरेटिव के साथ दिखाना है।

सनसनी ही आज के दौर की कथित प्रगतिशील पत्रकारिता है। बीबीसी ने नक्सलवाद तथा कश्मीर के आतंकवाद को ले कर अबतक जिस तरह की रिपोर्टिंग की है उससे उनके इरादों को भांपा जा सकता है।

ऐसे समय में जब तीन चौथाई परिक्षेत्र शांत है तथा घाटी में भी शांति के प्रबल प्रयास किये जा रहे हैं तब सनसनी फैला कर भारत को कमजोर करने के इन प्रयासों को अनदेखा करना ठीक नहीं है। इस तरह के प्रयासों को अलगाववादी पत्रकारिता की श्रेणी में वर्गीकृत किया जाना चाहिये। इस सरह के भ्रामक समाचार फैलाने वालों को सुविधा यह है कि इसका तत्काल संग्यान लिया जाता है। विपक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर भी अपना नम्बर बनाने से बाज नहीं आता। इधर बीबीसी ने एक फुटेज जारी किया और बिना एक पल की देरी के राहुल गाँधी का बयान भी आ गया। इतना ही कहना ठीक है कि इतिहास उनका स्वयं मूल्यांकन करेगा।

कश्मीर में एक धडा असंतुष्ट है और उसका विरोध जाहिर है। उनके असंतोष को दूर करने के प्रयास शांति के पश्चात ही किये जा सकते हैं। क्या यह सही समय है दबे असंतोष को हवा देने का? क्या यह सही समय है उकसाने का? पाकिस्तान के पास तो विकल्प नहीं हैं लेकिन विदेशी मीडिया और वामपंथी मीडिया जिस तरह का बरताव कर रहा है उसे समझने की आवश्यकता है।

समस्या यह है कि यदि इनपर प्रतिबंध लगाया जाये तो एनडीटीवी वाली कहानी हो जायेगी। इस मीडिया के मालिकों को मनी लॉन्ड्रिंग में संलिप्त होने के आरोपों के कारण विदेश जाने से रोका गया तो इतने भर से पत्रकारिता खतरे में आ गयी। यदि एजेंडा पत्रकारिता पर रोक लगायी गयी तो अरबन नक्सलियों का हुआ-हुआ पुन: आरम्भ हो जायेगा। इस समय मुख्यधारा मीडिया की नहीं सोशय माध्यमों की बडी जिम्मेदारी बनती है कि मुखर हो कर विरोध करें। पत्रकारिता को जिंदा रहना है तो उसे अपने कलंक भी धोने होंगे।

राजीव रंजन प्रसाद 

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