ईमानदारी सुनने में अच्छी लगती है लेकिन असल में बहुत तकलीफ देती है, क्या वाकई अपने बच्चो के भविष्य के लिए इमानदारी के लिए कुर्बानी देने का समय है या फिर अब बस  बहुत हो गया है – आशु भटनागर

1
362
views

ईमानदारी बहुत कुर्बानी मांगती है,

फरवरी २०११ में मुझे गौरव बक्षी मिले और उन्होंने अप्रैल में होने वाले किसी अरविन्द केजरीवाल के आन्दोलन जिसमे महाराष्ट के कोई अन्ना हजारे भी अनशन पर बैठेंगे के लिए डिजिटल प्रमोशन के लिए मदद मांगी, चूँकि हमारी कम्पनी Brahmam Technologies डिजिटल मीडिया मार्केटिंग कम्पनी है और गौरब का नाम उन दिनों भ्रश्टाचार के खिलाफ नॉएडा के अखबारों में आ चूका था तो मैंने कहा ठीक है,  उसके बाद गौरव भ्रष्टाचार ले खिलाफ चूसना बंद के नाम से भी एक प्रोजेक्ट लेकर आये वो अलग बात है लेकिन अब मुद्दे पर आते है ,

२०१११ अप्रैल में भ्रश्टाचार के खिलाफ वो मुहीम अचानक ही लोगो की जुबान और दिल में घर कर गयी , हर कोई खुश था जेपी के बाद लोगो को एक बार फिर लगने लगा था की देश को दूसरा गांधी मिल गया है दिल्ली और आसपास के लोगो में गजब का उत्साह था लोगो ने उस आन्दोलन के लिए खुल कर मदद देनी शुरू कर दी थी I

मुझे याद है उस दौर में हमसे अपने व्यवसाय के लिए प्रमोशनल SMS की सर्विसेज लेने वाले छोटे छोटे व्यापारी जैसे ब्यूटीशियन, प्रापर्टी डीलर जैसे लोग भी अपने खर्चे से उस आन्दोलन के लिए प्रचार के अनुरोध करते थे सबकी जुबान पर एक ही बात थी आशु भैया एक आदमी  हमारे परिवार लिए अनशन पर बैठा है हम कुछ पैसा भी नहीं खर्च कर सकते है क्या ?

मैं खुद हैरान था उन दिनों रामलीला मैदान देश में सबसे पवित्र स्थान बन गया था लोग अब दिल्ली ही नहीं देश के कौने कौने से आने लगे थे I

तत्कालीन कांग्रेस सरकार मुझे याद है इन सब से इतनी परेशान थी की इसका दमन करने की सभी कोशिशे करके थक चुकी थी दरअसल इसमें सबसे बड़ी समस्या थी की उसके अपने नेता भी जो देश के लिए सोचते थे दिल से इस आन्दोलन के साथ थे , राम लीला मैदान में आर एस एस के स्वयं सेवक स्वत बिना किसी योजना के वहां पानी , खाने की वयवस्था करने लगे थे ये सब इतना अचानक और अप्रत्याशित था कि उन दिनों का सोचता हूँ तो लगता है की आखिर वो उर्जा वो चेतना क्या फिर कभी दुबारा आ पायेगी ?

उस आन्दोलन की महान उर्जा ने आम आदमी पार्टी को जन्म दिया, तो बीजेपी को दुबारा सत्ता में लौटेने की संजीवनी जिसके फलस्वरूप केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री और नरेंद्र मोदी उसी राजधानी दिल्ली यानी भारत के प्रधानमंत्री ..

इसके बाद शुरू हुआ सरकारों के काम काज का तरीका , इसमें कोई शक नहीं प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगो की आकांक्षाओ को पूरा करने के लिए कई कार्य करने शुरू किये , ना खाऊंगा ना खाने दूंगा जैसे नारे के लिए २०१४ के दिन भी मुझे याद है सब सचिवालयो के कर्मचारी कांग्रेसी शासन के अपने सुनहरे दिनों के लिए तरसने लगे , कम से कम दर्जन भर अधिकारियों ने कहा की अगर ऐसे ही चला तो हम VRS ले लेंगे ..

खैर मोदी अपनी स्पीड से काम करना चाहते थे और करते जा रहे थे और सरकारी अम्लो में लोग थोड़े बहुत प्रतिरोध के बाद उनके रंग में रंगने के लिए मजबूर होते जा रहे थे

उस दिनों NIC में कार्य कर रहे मेरे एक मित्र ने मुझे एक दिन बातचीत में कहा की यार काम करने के तरीके बदल गए है अब प्रोजेक्ट टाइमलाइन हमसे पुछ कर सेट नहीं होती है बल्कि प्रधान मंत्री की डेट आ जाती है की हमें इस डेट को फलां प्रोजेक्ट को शुरू कर देना है ऐसे में अब वर्क कल्चर बिलकुल कोर्पोरेट वाला हो चला है

खैर जब आदमी अच्छे काम करता है तो और बहुत जल्दी करता है तो कुछ कमियां भी होती है वो भी समय से पर आती गयी लेकिन मोदी अपनी स्पीड से काम करने में लगे थे उनका एक ही उद्देश्य था ४ साल में देश को एक सम्मान जनक स्थिति में खड़ा कर देना जिसके लिए उनकी सबसे महत्वाकांक्षी योजना नोटबंदी भी आई जिसके लिए २०११ से कई अर्थशास्त्री सलाह दे रहे थे , मोदी सरकार ने सही समय देख कर उसको भी अंजाम दिया और इसके बाद एक बेहद कडवा फैसला GST को लागू करके लिया जिसको कांग्रेस १० सालो से टालती आ रही थी I

लेकिन जैसे मैंने पहले भी कहा इमानदारी सुनने में अच्छी लगती है लेकिन असल में बहुत तकलीफ देती है I २०११ में खुद भ्रश्टाचार के खिलाफ sms करवाने वाले छोटे छोटे व्यापारी नोटबंदी और GST के चलते परेशान होने लगे , सरकारी सिस्टम में आने से पैसे का फ्लो कम होना और नए नियमो का पालन मुश्किल लगने लगा है

ऐसे में ८ सालो की इमानदारी का भुत अब जनता के सर से उतरने लगा है I लोगो को लगता है इससे तो भ्रष्टाचार ही सही था कम से कम ४ पैसे की रिश्वत देकर हम तो पैसे कमा ही रहे थे

कल तक महान नेता लगने वाले मोदी अब खलनायक बन चुके हैं और माध्यम वर्ग की आँखों में खटकने लगे है I उन्हें लगता है की आखिर मोदी ने दिया हु क्या है ?

आखिर फिर से राहुल को क्यूँ ना लाया जाए कम से कम ऐसी इमानदारी से तो मुक्ति मिलेगी ?

हमेशा पैसो में खेलने वाले इस मध्यमवर्ग जिसमे पत्रकार , प्रोफ़ेसर और सरकारी कर्मचारी सब शामिल थे अब शुरू किया है अपना खेल जिसकी परिणिति हम ५ राज्यों के चुनावों में हम देख चुके है

लगभग ५ महीने पहले जब मोदी सरकार के विरोध को लेकर मेरे एक मित्र ने देश भर में प्रेस कांफ्रेंस करनी शुरू की तो मुझे लगा की आखिर ये खेल क्या है लेकिन वो तैयारी थी लोगो के दिलो मे मोदी सरकार को धीरे धीरे डेंट करने की और उसके बाद राफेल में खुद राहुल गांधी ने सामने आकर जिस तह कहा की चौकीदार ही चोर है उसने मोदी और बीजेपी की बिसात ही बदल दी

कल तक राजनीती के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह सारे चुनाव में खुद को सही साबित करने में लगे रहे और ईमानदारी से तंग जनता ने उनके खिलाफ निर्णय दे दिया 

आज एक बार फिर से २०१९ की तैयारी है ?

हमें फिर से सोचना है की क्या वाकई अपने बच्चो के भविष्य के लिए इमानदारी के लिए कुर्बानी देने का समय है या फिर अब बस  बहुत हो गया है, हमसे इतना ईमानदार होकर जीना जिया नहीं जा सकता है ऐसी सरकारों का ना रहना ही है ?

आप लोगो का फैसला ही २०१९ के बाद देश का भविष्य तय करेगा

आशु भटनागर 

लेखक सीरियल एंटरप्रेनौर है, पिछले १८ सालो से आईटी , डिजिटल मीडिया मार्केटिंग और वेबमीडिया से जुड़े है कालिदास क्लब समेत कई अन्य मीडिया पोर्टल का संचालन भी करते है 

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

"कालिदास क्लब  "पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से "कालिदास क्लब के संचालन में योगदान दें।