भाजपा क्यों हारी ? अगले पांच महीनों में क्या? डॉ पवन विजय

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नरेंद्र मोदी ने लोमड़ी का गुण अपनाना चाहा जिसका परिणाम उन्हें मिल गया है. जब शेर अपनी चाल और खाल बदल देता है तो उसका मुंह कुत्ते भी चाटने लगते हैं. भारत की जनता बहुरूपियों से परशान थी इसलिए उसे ऐसे नेता की तलाश थी जो जैसा दीखता है वैसा ही होने में कोई फर्क नही रखता है पर मोदी ने जिस तरह से अपने चेहरे के ऊपर चेहरा लगाया उससे हम सभी को यही लगा कि यह कोई कांग्रेस का आदमी है क्या ? कांग्रेस केवल राहुल वाले कांग्रेस ही नही है बल्कि उद्धव ठाकरे की भी कांग्रेस है ओवैसी की भी कांग्रेस है. सपा भी बसपा भी आप भी है. अकादमिक जगत से लेकर मीडिया तक हर जगह कांग्रेस पार्टी व्याप्त है. मोदी जिस कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते थे शायद वह तो गाँधी परिवार की बपौती से लोगो को आज़ाद कराने की बात करते थे पर और जगह से कौन आज़ाद करायेगा ? हर जगह यही लोग भेस बदल कर बैठे हैं पत्रकार के नाम पर, शिक्षक के नाम पर, अधिकारी के नाम पर, सामजिक कार्यकर्ता के नाम पर. मोदी यहीं चूक करते गये. अगर किसी कांग्रेसी को हटाया तो उसकी जगह दूसरे कांग्रेसी या किसी अकुशल चमचे को को बैठा दिया. इन चमचों ने पार्टी की थाली में खाया और उसी में छेद कर दिया.

क्या कारण है कि सुरेश चिपलूनकर से लेकर उत्तर प्रदेश के सुदूर गाँव का एक बूढा कह रहा कि उम्मीद पूरी नही हुयी. कौन सी उम्मीद ? क्या कोई कह रहा था कि उसे महले दू महले बनवा दो, नहीं आप याद करिए जब सपा या कांग्रेस या किसी और पार्टी की सरकार बनती है तो कार्यकर्ता खुद को मुख्यमंत्री से कम नही समझता और सबसे पहले उनकी बात उनकी आवश्यकताए उनकी जरूरते पूरी की जाती हैं उन्हें नेतृत्व पूरा मान देता है जबकि साधे चार सालों में भाजपा के कार्यकर्ता और उसे समर्थन देने वालों की हालत कुत्तों से भी गयी गुजरी हो गयी है. कब तक वह भूखे पेट रहकर नेताओं के घर भरेगा ? मेरा निजी अनुभव है कि कांग्रेस एक एक ट्वीट के पांच सौ से हजार रूपये देने का प्रस्ताव रखती है मैं यह नही करता कि भाजपा भी ऐसा करे पर कम से कम उसे कार्यकर्ताओं के परिवार उनकी जरूरतों पर कुछ चर्चा तो कर लेनी चाहिए. नेता हो गये तो पगला गये जैसे फिर से चुनाव में आना ही नही है. नरेंद्र मोदी और भाजपा का कमजोर होना देश का कमजोर होना है यह बात मै ख़म के साथ कहता हूँ पर यह कमजोर करने का काम स्वयं मोदी और भाजपा खुद कर रहे हैं.

अमित शाह को अपनी रणनीति पर बहुत गुमान है पर जब धरातल ही नही रहेगा तो रणनीति कहा पर बनाओगे ? इस व्यक्ति का सलाहकार कौन है ? सबका साथ सबका विकास की बातें करते करते केवल एक वर्ग का साथ और विकास की बातें बड़े विकृत ढंग से होने लगी. किसी घटना पर तुरंत और स्पष्ट एक्शन न लेना साफ़ सी बात न करना …. आप किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे ? लोग कहेगे कि एक हार के बाद मैं ये सब लिख रहा किन्तु उन्हें २०१४ में मेरा लिखा ब्लॉग पढ़ लेना चाहिए जिनमे मैंने ये सब बातें पहले ही कही हैं. इतनी सारी योजनायें बनी हैं किन्तु धरातल पर उनको देखने वाले लोग कैसे हैं ये कौन सुनिश्चित करेगा ? मैं कांग्रेस का समर्थन नही कर रहा पर कांग्रेस के लोगों को घटिया नरेश अगरवाल को लेने से आप परहेज नही करते तो ऐसे लोगों का समर्थन करना मजबूरी बना दिया अमित शाह ने और ऐसे लोग वक़्त के साथ अपना रंग दिखाना शुरू करते है जैसे दिखा रहे हैं.

अभी पांच महीने बचे हैं … पांच महीने में सिर्फ पांच काम …
१. राम मंदिर तुरंत बने
२. भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस और कड़ी सजा
३. बल्क एम्प्लॉयमेंट और योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन
4. कार्यकर्ताओं का समायोजन
५. किसानों की समस्याओं का तुरंत निदान

डॉ पवन विजय की फेसबुक वाल से

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