इलाहाबाद का नाम प्रयागराजः मसला तो विशुद्ध राजनैतिक है, लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ है- दीपक पाण्डेय

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जब आपको लगता है कि नाम बदलने से कुछ नहीं होने वाला… तो अब बदल गया है तो उससे भी कुछ नहीं ही होने वाला है.. वो मसला अलग है… फिलहाल मुझे उस पर नहीं जाना…

बात ये है कि नाम भी बहुत कुछ कहता है… और यह विशुद्ध रूप से राजनैतिक  मसला है..  इसे दूसरे शब्दों में मौके पर चौका मारना या एक पंथ दो काज भी कह सकते हैं….

तीसरे शब्दों में इस पूरी कवायद को नवरात्रि में संत समाज की मांग को उचित मान (हिंदूत्व की नई परिभाषा देने वाली पार्टी ध्यान दे) देना भी कह सकते हैं..

बाकी मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि शहरों का नामकरण पार्टियों और नेताओं के लिए एक दुकानदारी की तरह है..और यह नया मसला भी उसी कवायद की एक कड़ी मात्र है.. जो नया नहीं है.. यह आजादी के बाद से ही चला आ रहा है…

अगर नाम का खेल नहीं होता तो आज प्रयागराज के जिस स्वरूपरानी अस्पताल का नाम स्वरूपरानी अस्पताल है… उसका नाम ठाकुर रोशन सिंह(कृपया गूगल करें) अस्पताल होता.. और अल्फ्रेड पार्क (जिस जगह आजाद शहीद हुए) के नाम को चन्द्रशेखर आजाद पार्क करने के लिए सामाजिक संगठनों को आगे नहीं आना पड़ता.. यह कार्य सरकार स्वतः करती..

खैर… अब फिर नाम बदलने पर आते हैं… वास्तविकता में नाम में कुछ नहीं रखा है..ऐसा वो भी कहते रहे हैं.. जो आज इसका विरोध कर रहे हैं…  ये फैसला भले एक राजनैतिक फैसला हो…  लेकिन इसकी अहमियत वही संत समाज समझ सकता है… जो वर्षों से इसकी मांग कर रहा था… इसके अलावा आज भी कई संत और सामाजिक संगठन इस शहर को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं..

यह शहर राजनीति का केन्द्र बाद में हुआ… लेकिन करोड़ों की आस्था का केन्द्र पहले है.. और इस शहर की पहली पहचान गंगा-यमुना का संगम… और बाकी चीजें बाद में हैं..

बाकी अगर कोई ये कह रहा है कि यह किसी खास समुदाय को नीचा दिखाने के लिए किया गया है तो यह खिसियान बिल्ली खंभा नोचने से ज्यादा या उन्हें भड़काने से ज्यादा कुछ नहीं है.. मुझे उस पर नहीं जाना… सबको बोलने और कहने का अधिकार है..

पर इतना जान लीजिए कि यह मांग आज की नहीं… बल्कि पिछली सरकारों (कांग्रेस के कार्यकाल में भी) में भी संत समाज ने उठाया था…  पर उन्होंने उनकी एक नहीं सुनी..

आज जब इस सरकार ने इसी मांग को (फिर वह राजनैतिक तौर पर ही क्यों ना हो) न केवल माना बल्कि भुना भी रही है… तो फिर समस्या क्यों हो रही है? नाम ही तो बदला है… सूरत तो नहीं…

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सूरत बदलने की है…  अगर वह सूरत बदल देती है… तभी उसकी कवायद सफल मानी जाएगी…

कुछ फैक्ट

  • शहर के साथ पूरे जिले का नाम बदला है… उसके मुहल्लों का नहीं…
  • मुगलिया सल्तनत की निशानी केवल किला और खुशरूबाग है… पूरा शहर या पूरा जिला नहीं…
  • मुसलमानों की आबादी केवल शहर, उसके उपशहर, कस्बों और कुछ गांवों में है… पूरे जिले में नहीं…
  • विश्व भर में प्रयागराज की पहचान अध्यात्मिक केन्द्र,  गंगा-यमुना के संगम और कुंभ से हैं… मुगलकाल से नहीं…
  • इलाहाबाद नाम मूलतः अंग्रेजों ने लिखना शुरू किया…  मुगलों ने नहीं… इलाहाबाद अकबर के ही नाम इल्लाहाबास का अपभ्रंस है…
  • प्रयागराज हिंदूओं का अध्यात्मिक केन्द्र था/ है.. मुगलों का नहीं..
  • इसकी अध्यात्मिक अहमियत को ही देखते हुए अकबर ने इस इल्लाहाबास यानि ‘अल्लाह का शहर’ या हिंदी में ‘ईश्वर का नगर’ रखा..  क्योंकि यह जगह हिंदूओं की पवित्र जगह थी.. और यह दीन-ए-इलाही नामक नए धर्म से प्रेरित था…  दीन-ए-इलाही में केवल इस्लाम नहीं… बल्कि हिंदू, बौध,  पारसी, जैन एवं ईसाई धर्म के भी तत्व शामिल थे..
  • तुलसीदास ने रामचरित मानस में जिस अक्षयवट का जिक्र किया है… वह अकबर के किले परिसर के अंदर है… जो आज पातालपुरी अक्षयवट के नाम से जाना जाता है..
  • बड़े हनुमान जी (बंधवा या लेटे हुए हनुमान ) के मंदिर को बचाने के लिए उक्त जगह पर किले की दीवार टेढ़ी कर दी गई है.. मंदिर के पीछे की दीवार टेढ़ी ही है.

ऐतिहासिक फैक्ट
मुगल बादशाह अकबर के राज इतिहासकार और अकबरनामा के रचयिता अबुल फज्ल बिन मुबारक ने लिखा है कि 1583 में अकबर ने प्रयाग में एक बड़ा शहर बसाया और संगम की अहमियत को समझते हुए इसे इल्लाहाबास यानि ‘अल्लाह का शहर’, नाम दे दिया…यहां पर अकबर ने संगम तट पर किले का निर्माण कराया…

  • किले के निर्माण के बाद ही शहर ने स्थाई रूप लिया… यहां का मशहूर बख्शी बांध अकबर के इंजिनियर बख्शी ने बनाया था, जो आज तक टूटा नहीं…  इसी बांध के बनने के बाद वजह से नदियों को एक निर्धारित रास्ता मिला…
  • वर्ना दोनों नदियों के कटान के कारण इसका स्वरूप कई बना और बिगड़ा.. लेकिन बांध बनने के बाद स्थाई रूप से घर बनाने और लोगों के बसने का सिलसिला शुरू हुआ..
  • जब भारत पर अंग्रेज राज करने लगे तो रोमन लिपी में इसे ‘अलाहाबाद’ लिखा जाने लगा… नाम बदलने जाने के पहले भी यह शहर धार्मिक रूप से संपन्न था… जिसके प्रमाण ऐतिहासिक रूप से सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ई. के समय से प्राप्त होते हैं…
  • इलाहाबाद के किले परिसर से ही सटे मदनमोहन पार्क में अशोक स्‍तम्‍भ  भी है… जो 232 ई.पू. के समय को प्रदर्शित करता है..
  • अशोक स्तम्भ पर तीन शासकों के लेख खुदे हुए हैं.. यह पुरातात्विक समय का उत्कृष्ट नमूना है…
  • बौद्ध काल में प्रयाग की महत्ता का प्रमाण अशोक स्तंभ के ऊपर उत्कीर्ण अभिलेखों से भी मिलता है…
  • 200 ई. में समुद्रगुप्त इसे कौशाम्बी से प्रयाग लाया और उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग-प्रशस्ति इस पर ख़ुदवाया गया..
  • बाद में 1605 ई. में इस स्तम्भ पर मुग़ल सम्राट जहाँगीर के तख़्त पर बैठने का वाकया भी ख़ुदवाया गया…

पौराणिक ग्रंथो में प्रयाग 
हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मांड के निर्माता ब्रह्मा ने इसकी रचना से पहले यज्ञ करने के लिए धरती पर प्रयाग को चुना और इसे सभी तीर्थों में सबसे ऊपर, यानी तीर्थराज बताया..

कुछ मान्यताओं के मुताबिक ब्रह्मा ने संसार की रचना के बाद पहला बलिदान यहीं दिया था, इस कारण इसका नाम प्रयाग पड़ा… संस्कृत में प्रयाग का एक मतलब ‘बलिदान की जगह’ भी है..

तुलसी दास जी ने भी राम चरित मानस में प्रयाग का बहुत ही सुंदर उल्लेख निम्न पंक्तियों के माध्यम से किया है..

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।

अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।

चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्री मुख तीरथराज बड़ाई।

करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।

सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।

-दीपक पाण्डेय

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